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29 May, 2020

"काका हो माल खरचा कर$, सब एहिजे बेवस्था हो..!"

जब से गेनापुर जैसे पिछड़े गांव में मिनी बैंक यानी सीएसपी खुला था। सुभाष के बल्ले-बल्ले हो गए थे। मैट्रिक तक पढ़ा था। कम्प्यूटर चलाने की जानकारी भी थी। उसने सीएसपी की फ्रेंचाइज़ी ले ली। और पैसे की जमा-निकासी के साथ ही किसानों से जुड़े अन्य फ़ॉर्म भी भरने लगा। कम ही समय में भोले-भाले खेतिहर मजदूर किसानों में उसकी पैठ बन गई थी।

दीनानाथ उर्फ दीनू उसका लंगोटिया यार था। हमेशा गुटखा से मुंह को लभेरे रहता, पल्सर बाइक से चौक-चौराहे पर घूमता और ब्लॉक की नई-नई योजनाओं की टोह में रहता था। फुर्सत में सीएसपी पहुंच जाता। वह बिचौलिया का काम कर पेट्रॉल से लेकर घर का खर्च चला ही लेता। जरूरतमंदों को सूद पर पैसे देकर अच्छी कमाई भी करता था। इसीलिए दोनों में ख़ूब पटती थी, मिल-जुलकर शिकार करते। आज वह सीएसपी आया ही था कि उसे पड़ोसी चुलाई काका दिख गए।

"बोलीं महतो जी, बड़ी देर से खड़िआइल हई। पसेना से पूरा देही भींज गइल बा। एतना घामा में केने चलल बानी?" यह पूछते हुए सीएसपी संचालक सुभाष ने उन्हें एक नज़र देखा और लैपटॉप पर नजरें गड़ा दी।

बुजुर्ग चुलाई महतो ने हाथ में पकड़ी लाठी को कांख के नीचे टिकाया। आंखों का मोतियाबिंद पक जाने के कारण साफ़ नहीं दिखाई पड़ता था। इसलिए नाक पर चुकर आए ढीले चश्मे को उपर की तरफ़ सरकाते हुए बोले, "का दु मोदी जी सभके खातवा में दु हजार भेजत बाड़े। हमरा ना मिली का बबुआ?

"काहे ना मिली। आवेदन भरीं। रउआ खाता में भी आई।" इस पर महतो जी ने फिर सवाल किया, "ओकरा ला कवन-कवन कागज़ करावे के पड़ी?"

"कवनो हाथी-घोड़ा थोड़े लागी। आधार कार्ड, बैंक खाता, खेत के रसीद आ राउर अंगूठा के फिंगर प्रिंट देवे के पड़ी।" सुभाष का जवाब सुन उन्होंने ने कहा, "सब कागज़वा त बटले बा। मने जमींन के रसीदवा कइसे कटी? अब बुढ़ौती में हमरा से दउड़ भाग होई।"

इसके आगे कुछ और बातें होतीं। वहीं पर खड़े दीनू ने सुभाष की ओर देखकर हौले से आंखें मिचकाई। इशारों में ही दोनों की बातें हुई और एक कुटिल मुस्की छूट पड़ी। दीनू ने मुंह से मटमैले पीक को बाहर थूका दिया। जोर से गला खंखारते हुए कहा, "काका हो माल खरचा कर$, सब एहिजे बेवस्था होई जाई।"

"हम ठहरनी निपढ़ अदमी। एहि से नु पूछत बानी, केतना देवे के होई?" अबकी उनके सवाल पर सुभाष ने चिरपरिचित घाघ स्वर में कहा, "रेट फिक्स बा। दु सौ रुपए में कृषि विभाग के रजिस्ट्रेशन होई। आ बाकी काम ला दीनू से बतिया ली।"

उसने तपाक से कहा, "एमे रेट का पूछे के बा। सब केहु दु हजार देता। काका 15 सौ दे दिहे त काम हो जाई।" दीनू की मांग सुनते ही महतो जी ने कहा, "हमनी गरीबन के लगे एतना पइसा कहवां से आई। तनिका कम करीं।"

यह सुन उसने कहा, "एहि से पान सौ कमे मंगनी ह। एमे ऊपर ले नु खरचा लागेला। ना दिहल जाई त लाइने में रह जाएम। देखनी नु ढोड़ा भगत के, कहत रहले एके हजार में हो जाई। छव महीना से उनकर काम पेंडिंग में बा।"

"छोड़$ मरदे ढोड़ा के का बात, ढेर तेजा बनेलें। बेसी होशियारे के नु तीन जघे लागेला।" महतो जी ने कमर में ऐंठकर खोंसी गई धोती के किनारे को बाहर किया। उसमें से दो सौ रुपए के दो, सौ रुपए के दो और 10 रुपए के 10 तुड़े-मुड़े नोट निकाले।

फिर सुभाष को दो सौ रुपए दिए और खींसे निपोरते हुए बोले, "तीन हजार में पाड़ी बेंचले रहनी। मेहरारु के डायरिया भइल रहे। पानी चढ़ाई में उठ गइल। अब एतने बाचल बा, रउआ कम्पूटर में नाम चढ़ा दिही।"

आप पढ़ रहे हैं श्रीकांत सौरभ की कहानी - बिचौलिए

उसने रुपया का काउंटर में रखकर लैपटॉप से नेट कनेक्ट किया। मोज़िला ब्राउज़र में कृषि विभाग के वेबसाइट पर जाकर फ़ॉर्म खोलकर भरने लगा। कुछ देर के लिए वहां चुप्पी छा गई। सर्वर व्यस्त देख सुभाष ने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया, "बेटवा कमाता त का हो जाता महतो जी? सब रुपया दाबके का करेम?"

मानो उसने ये कहकर उनकी दुखती रगों पर हाथ फेर दिया। वे शुरू हो गए, "अब उ हमार बेटा ना अपना मेहरी के मरद बन गइल बा। बियाह भइला दु साल भइल। आजु ले एको चवनी कमाके देले होई। पतोह ओइसने बिया। एह घड़ी के नवकी जनाना आव$ तारी स। आवते 'पिया सुनरा हम सुनरी अउरी सभे बनरा बनरी' जपे लागत बाड़ी स। आ एगो बात जान लीं बबुआ, एकलवत लइका जनमावल पाप के काम बा एह बेरा।"

इसी बीच फ़ॉर्म का काम पूरा हो गया। उसने प्रिंटर से एक पन्ना निकाला। उसका लेमिनेशन कर उनको देते हुए कहा, "राउर रजिस्ट्रेशन हो गइल। ई परची सम्हार के राखेम। फेरु विहने संझिया के आएम त आवेदन भरा जाई।"

इसके बाद महतो जी दीनू से मुख़ातिब होकर बोले, "हई पान सौ राख ल$ आ एक हज़ार उधारे रही, जल्दिए चुका देम।" तो उसने भाव खाते हुए तैश में कहा, "ना ना एमे उधार-बाकी ना चलीं। किसान सम्मान निधि के पइसा नु ह। एहिंगे साल में छव हजार उठइब$ का!"

"आछा त ठीक बा। करजे बुझिके अपना ओरी से एक हजार लगा द। हम दे देहम।" इस बात पर उसने कहा, "10 रुपया सैकड़ा बेयाज लागी, एक हजार पर 100 रुपया के महीना। आ जबे तोहार पइसा एहिजा खाता में आई। कुल्ही निकाल के भर देवे के होई। मंजूर होखे त बोल$?"

इस बार महतो जी ने बिना किसी हिल-हुज्जत के उसकी शर्त मान ली। बस इतना ही बोले, "आछा जइसन तोहार विचार। मने देखिह$ बाबू, काम गबड़ाए के ना चाहीं।" बाहर में धूप तेज निकल आई थी। उन्होंने लू से बचने के लिए कंधे पर रखे गमछे को पगड़ी बना सिर में लपेटा। और लाठी टेकते हुए वहां से निकल लिए।

©️श्रीकांत सौरभ (नोट - मनोरंजन के लिए लिखी गई यह कहानी, पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें ज़िक्र किए गए जगहों या पात्रों के नाम की, किसी भी वास्तविक जगह, जीवित या मृत व्यक्ति से समानता संयोग मात्र कही जाएगी।)


1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर और मार्मिक।
पत्रकारिता दिवस की बधाई हो।