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31 May, 2020

तहे तहेे दिल से लहे लहे दिल से सुक्रिया आदा कर$..!

अथ श्री नाच महातम कथा : चम्पारण में पलल-बढ़ल ऊ अदमी के लड़िकाई भी कवनो लड़िकाई भइल। जवन लवंडा नाच देखिके सग्यान ना भइल। तनिका इयाद करीं बरिस 1985-99 के गुजरल जमाना। गांव के शादी-बियाह के सीजन, जब बरिआत मरजाद रहत रहे। जवना बेरा मनोरंजन के खातिर ना डिश टीवी, ना एंड्राइड मोबाइल के सुविधा रहे। सिनेमा हवल खलिहा शहरे में रहे। ओह घड़ी केतना नाच मंडली जवार में हिट रहे।

पूर्वी चम्पारण के कोटवा के मैनेजर जादो, मंटू सिंह, बकुलहरा के चौधुर जी, गायघाट के वीरा जादो के नाच के सुपर स्टार लवंडा अनिल आ ऐनुल, जादोपुर के रामशंकर यादव के नाच, जिलदार जादो के नाच के गंगा लवंडा, इब्राहिमपुर के खीरा जादो के नाच के लवंडा रमेश का नाम अभियो केतना जने के इयाद होई। पश्चिमी चम्पारण (बेतिया) के रुलही के संत दुबे, मंगलापुर के महातम पांडे से लेके रामनगर, नरकटियागंज आ बगहा तक ले..! अब केतना नाच मालिक का नाम लिखल जाव। बाकिर जेतना भी नाच पार्टी रहे सबमें थरुहट आ नेपाल के बेसी कलाकार भरल रहे।

नगारची, तबालची, ढोलकहिया, हरमुनिया मास्टर, बैजू भा कैसियो मास्टर, कॉमेडियन, अनाउंसर सभके महातम रहे। केतना बखान कइल जाव। एहि से बुझ लीं, एगो नीमन जोकर अकेले प्रोग्राम हिट करा देवे। मज़ाक मज़ाक में गहिराह बात कह देवे। मने केहु के बेजाए ना लागे, उलटे देखनिहार हंस देवे। आ जवन बरिआत में लवंडा नाच ना जाए ओमे कबो-कबो ढेला चल जाए। खिसियाके सामियाना के डोरी काट द स लइका। कहल त इहो जाला कि बीरा जादो आ महातम पांडे के नाच के हजुरा, बाई जी के नाच के जाए।

जहिया गांव में कवनो बरिआत आवे, छावरिक सभे टोह में रहे, केकर नाच आइल बा। ओने बरतिया खाए जाए, एने नाच के टीम-टाम शुरू हो जाए। जब लाउडस्पीकर से हरमुनिया, बेंजु से बजावत लहरा सुनाए लागे। नाचदेखवा सरतिया लो के बेचइनी बढ़ जाए। केतना जल्दी बरतिया के खियाके, सभे नाच देखे जनवासा में पहुंच जाव। 52 चोप के सामियाना के भीतरी बिछावल दरी प लइकन भर जा स, चारु ओरी से गोल-गोल घेरके। आ बीचे में प्रोग्राम होखे। उमिर के लिहाज़ से बड़-बुज़ुर्ग लो चोप के अरिया बइठे लो नुकाके भा राउटी में सुतिके झांके लो।

कुछ रसिकदार लो जइसे दूल्हा के चाचा, मामा, फूफा, मउसा के कपार प जब सुबोधवा के निसा चढ़ जाए। उमिर के लोक-लिहाज ना कके अगाड़ी बइठके रुपया लुटावत रहे लो। बंदूक आ गद्दी के सवखिन कम ना रहलें। बोलीं त अइसन शमां बन्हा जाए सामियाना में, एक बेर आरती से शुरू भइल सफ़र चितरहार, सहला प्रोग्राम से लेके डरामा प जाके खतम होखे। का मजाल जे नाचदेखवा तनिको एने ओने हिल जास ओहिजा से। हाफ इंच छेदा वाला ढोडी देखावत, चउकी के तुड़ देवे वाला बुता से गोड़ कूदावत, डाड़ लचकावत लवंडा। कवनो के लुक एकदमे हीरोइन निहर रहे त कवनो छाका जइसन लाग$ स।

मने चोकटाइल गाल वाला बुढ़वन लवंडा के बनावटी केस। पाउडर के डिब्बा लगाके बनावल छाती आ ओहनी के गोड़ के फाटल मोजा देखिके खूबे हंसी आवत रहे। मनोरंजन के बाचल खुचल कमी ऊ लो के मुंहवा प आइल पसेना पूरा क देवे। जब गलिया प पोतल मुरदासंख दहा जाए त चेहरा देखे लायक रहे। ओह बेरा गनवो कइसन कइसन आवत रहे। 'बथता आई हो दादा बथता..., गरमी से चुअता पसेनवा..., मारुती कार के अजब बहार इयार तनि हांक के देखना..., कॉलेजिया लईका ढूंढ़ लईहा हमरा ला बाबू जी... लवंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए... केतना गिनावल जाव! 'सइया हमार हो नथुनिया पे गोली मारे..' गानवा प त केतना नचनिया सभे प गोली भी चल गइल रहे।

जब प्रोग्राम अपना चरम प रहे। ठीक ओहि बेरा भरल सामियाना में गुलाब जल वाला स्प्रे छिड़िकाए लागे। नाच के जोकर से ओकर ओतन नापल जाए। शुरुआत में आरती होखे। आ ड्रामा से पहिले सहला गावे लो, एमे सभे कलाकार ग्रुप में उतरे। रउआ इयाद बा कि भुला गइल बानी, जब 'चमकता जगमगाता है अनोखा राम का सेहरा... गावत गावत कवनो लवंडा, एकबैक समधी के गोदी में जाके बइठ जाए, नेग ला।

ओहि में दूल्हा के बाबूजी के नाम बोलवावेला केहु पहुना, चुपचुपवा कागज प नाम लिखके आ एगो दस टकिया लगाके लवंडा भीरी पहुंचा देवे। आ लवंडा गावल छोड़िके बिचही में कमरी पीस के मुंह चोन्हिया के कहे लागे, ' तहे तहे दिल से... लहे लहे दिल से सुक्रिया आदा... कर$ तानी रे दादा..!" ओकरा बाद गजबे लइकन के थपड़ी पिटाए लागे। अब जे होखे, जिनगी में जवन कुछो बीत जला ऊ लवटी के ना आवे। नाच त अभियो केनहु केनहु देखे के मिली जाला। मने ऊ माजा अब कहां भेटाए वाला बा।

©️श्रीकांत सौरभ


29 May, 2020

"काका हो माल खरचा कर$, सब एहिजे बेवस्था हो..!"

जब से गेनापुर जैसे पिछड़े गांव में मिनी बैंक यानी सीएसपी खुला था। सुभाष के बल्ले-बल्ले हो गए थे। मैट्रिक तक पढ़ा था। कम्प्यूटर चलाने की जानकारी भी थी। उसने सीएसपी की फ्रेंचाइज़ी ले ली। और पैसे की जमा-निकासी के साथ ही किसानों से जुड़े अन्य फ़ॉर्म भी भरने लगा। कम ही समय में भोले-भाले खेतिहर मजदूर किसानों में उसकी पैठ बन गई थी।

दीनानाथ उर्फ दीनू उसका लंगोटिया यार था। हमेशा गुटखा से मुंह को लभेरे रहता, पल्सर बाइक से चौक-चौराहे पर घूमता और ब्लॉक की नई-नई योजनाओं की टोह में रहता था। फुर्सत में सीएसपी पहुंच जाता। वह बिचौलिया का काम कर पेट्रॉल से लेकर घर का खर्च चला ही लेता। जरूरतमंदों को सूद पर पैसे देकर अच्छी कमाई भी करता था। इसीलिए दोनों में ख़ूब पटती थी, मिल-जुलकर शिकार करते। आज वह सीएसपी आया ही था कि उसे पड़ोसी चुलाई काका दिख गए।

"बोलीं महतो जी, बड़ी देर से खड़िआइल हई। पसेना से पूरा देही भींज गइल बा। एतना घामा में केने चलल बानी?" यह पूछते हुए सीएसपी संचालक सुभाष ने उन्हें एक नज़र देखा और लैपटॉप पर नजरें गड़ा दी।

बुजुर्ग चुलाई महतो ने हाथ में पकड़ी लाठी को कांख के नीचे टिकाया। आंखों का मोतियाबिंद पक जाने के कारण साफ़ नहीं दिखाई पड़ता था। इसलिए नाक पर चुकर आए ढीले चश्मे को उपर की तरफ़ सरकाते हुए बोले, "का दु मोदी जी सभके खातवा में दु हजार भेजत बाड़े। हमरा ना मिली का बबुआ?

"काहे ना मिली। आवेदन भरीं। रउआ खाता में भी आई।" इस पर महतो जी ने फिर सवाल किया, "ओकरा ला कवन-कवन कागज़ करावे के पड़ी?"

"कवनो हाथी-घोड़ा थोड़े लागी। आधार कार्ड, बैंक खाता, खेत के रसीद आ राउर अंगूठा के फिंगर प्रिंट देवे के पड़ी।" सुभाष का जवाब सुन उन्होंने ने कहा, "सब कागज़वा त बटले बा। मने जमींन के रसीदवा कइसे कटी? अब बुढ़ौती में हमरा से दउड़ भाग होई।"

इसके आगे कुछ और बातें होतीं। वहीं पर खड़े दीनू ने सुभाष की ओर देखकर हौले से आंखें मिचकाई। इशारों में ही दोनों की बातें हुई और एक कुटिल मुस्की छूट पड़ी। दीनू ने मुंह से मटमैले पीक को बाहर थूका दिया। जोर से गला खंखारते हुए कहा, "काका हो माल खरचा कर$, सब एहिजे बेवस्था होई जाई।"

"हम ठहरनी निपढ़ अदमी। एहि से नु पूछत बानी, केतना देवे के होई?" अबकी उनके सवाल पर सुभाष ने चिरपरिचित घाघ स्वर में कहा, "रेट फिक्स बा। दु सौ रुपए में कृषि विभाग के रजिस्ट्रेशन होई। आ बाकी काम ला दीनू से बतिया ली।"

उसने तपाक से कहा, "एमे रेट का पूछे के बा। सब केहु दु हजार देता। काका 15 सौ दे दिहे त काम हो जाई।" दीनू की मांग सुनते ही महतो जी ने कहा, "हमनी गरीबन के लगे एतना पइसा कहवां से आई। तनिका कम करीं।"

यह सुन उसने कहा, "एहि से पान सौ कमे मंगनी ह। एमे ऊपर ले नु खरचा लागेला। ना दिहल जाई त लाइने में रह जाएम। देखनी नु ढोड़ा भगत के, कहत रहले एके हजार में हो जाई। छव महीना से उनकर काम पेंडिंग में बा।"

"छोड़$ मरदे ढोड़ा के का बात, ढेर तेजा बनेलें। बेसी होशियारे के नु तीन जघे लागेला।" महतो जी ने कमर में ऐंठकर खोंसी गई धोती के किनारे को बाहर किया। उसमें से दो सौ रुपए के दो, सौ रुपए के दो और 10 रुपए के 10 तुड़े-मुड़े नोट निकाले।

फिर सुभाष को दो सौ रुपए दिए और खींसे निपोरते हुए बोले, "तीन हजार में पाड़ी बेंचले रहनी। मेहरारु के डायरिया भइल रहे। पानी चढ़ाई में उठ गइल। अब एतने बाचल बा, रउआ कम्पूटर में नाम चढ़ा दिही।"

आप पढ़ रहे हैं श्रीकांत सौरभ की कहानी - बिचौलिए

उसने रुपया का काउंटर में रखकर लैपटॉप से नेट कनेक्ट किया। मोज़िला ब्राउज़र में कृषि विभाग के वेबसाइट पर जाकर फ़ॉर्म खोलकर भरने लगा। कुछ देर के लिए वहां चुप्पी छा गई। सर्वर व्यस्त देख सुभाष ने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया, "बेटवा कमाता त का हो जाता महतो जी? सब रुपया दाबके का करेम?"

मानो उसने ये कहकर उनकी दुखती रगों पर हाथ फेर दिया। वे शुरू हो गए, "अब उ हमार बेटा ना अपना मेहरी के मरद बन गइल बा। बियाह भइला दु साल भइल। आजु ले एको चवनी कमाके देले होई। पतोह ओइसने बिया। एह घड़ी के नवकी जनाना आव$ तारी स। आवते 'पिया सुनरा हम सुनरी अउरी सभे बनरा बनरी' जपे लागत बाड़ी स। आ एगो बात जान लीं बबुआ, एकलवत लइका जनमावल पाप के काम बा एह बेरा।"

इसी बीच फ़ॉर्म का काम पूरा हो गया। उसने प्रिंटर से एक पन्ना निकाला। उसका लेमिनेशन कर उनको देते हुए कहा, "राउर रजिस्ट्रेशन हो गइल। ई परची सम्हार के राखेम। फेरु विहने संझिया के आएम त आवेदन भरा जाई।"

इसके बाद महतो जी दीनू से मुख़ातिब होकर बोले, "हई पान सौ राख ल$ आ एक हज़ार उधारे रही, जल्दिए चुका देम।" तो उसने भाव खाते हुए तैश में कहा, "ना ना एमे उधार-बाकी ना चलीं। किसान सम्मान निधि के पइसा नु ह। एहिंगे साल में छव हजार उठइब$ का!"

"आछा त ठीक बा। करजे बुझिके अपना ओरी से एक हजार लगा द। हम दे देहम।" इस बात पर उसने कहा, "10 रुपया सैकड़ा बेयाज लागी, एक हजार पर 100 रुपया के महीना। आ जबे तोहार पइसा एहिजा खाता में आई। कुल्ही निकाल के भर देवे के होई। मंजूर होखे त बोल$?"

इस बार महतो जी ने बिना किसी हिल-हुज्जत के उसकी शर्त मान ली। बस इतना ही बोले, "आछा जइसन तोहार विचार। मने देखिह$ बाबू, काम गबड़ाए के ना चाहीं।" बाहर में धूप तेज निकल आई थी। उन्होंने लू से बचने के लिए कंधे पर रखे गमछे को पगड़ी बना सिर में लपेटा। और लाठी टेकते हुए वहां से निकल लिए।

©️श्रीकांत सौरभ (नोट - मनोरंजन के लिए लिखी गई यह कहानी, पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें ज़िक्र किए गए जगहों या पात्रों के नाम की, किसी भी वास्तविक जगह, जीवित या मृत व्यक्ति से समानता संयोग मात्र कही जाएगी।)


28 May, 2020

गाते, बजाते या संगीत सृजन करते समय, आप दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान होते हैं!

चुरा लिया है तुमने जो दिल को..! दम मारो दम मिट जाए गम फिर बोलो सुबह शाम...! नीले नीले अंबर पर चांद जब आए, ऐ मेरे हमसफ़र एक ज़रा इंतज़ार..! ओ ओ जाने जाना ढूंढे तेरा दीवाना...! आंख है भरी भरी और तुम मुस्कुराने..! सन 1980 से लेकर वर्ष 00 तक के इन गानों में एक बात ख़ास है। सभी में म्यूजिक डायरेक्टर ने गिटार का भरपूर प्रयोग किया है। आरडी वर्मन, बप्पी लहरी, मिलिंद आनन्द, नदीम श्रवण से लेकर एआर रहमान आदि तक ने।

दरअसल गिटार की धुन की मधुरता ही ऐसी होती है। इसमें भले ही ठहराव नहीं होता। फिर भी इसकी आवाज़ सीधे किसी के रूह को छूती है। वैसे भी कला और साहित्य में संगीत का स्थान सबसे ऊंचा माना गया है। पूरा सामवेद ही इसी पर आधारित है। संगीत की जानकारी किसी के भी जीवन में बहार लेकर आती है। कहा भी गया है, "जब आप गा, बजा या संगीत सृजन कर रहे होते हैं। उस समय आप दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान होते हैं।"

लेकिन विडंबना है कि ये हुनर किसी को भी विरासत में ही मिलता है। प्रशिक्षण से उसमें महज़ निखार लाया जाता है। हर आदमी के जीवन में एक मोड़ जरूर आता है। जब वह किसी न किसी वाद्य यंत्र की ओर आकर्षित जरूर होता है। बांसुरी, हारमोनियम, सितार, बैंजो, तबला, नाल, वायलिन, मेंडोलिन, पियानो (ऑर्गन), गिटार...! जिसके प्रति भी हो। अब इसे सिनेमा के गीतों का असर कहें या ग्लैमर। कैम्पस के दिनों में किशोरवय लड़कों में एक बड़ा भ्रम रहता है। वे गिटार बजाएंगे तो लड़कियां उनकी तरफ़ खींचीं चली आएंगी।

ऐसा होना स्वाभाविक भी है। दरअसल ये उम्र ही ख़्वाबों और ख्यालों में खोने की होती है। कल्पना में होती है एक ऐसी रूमानी जगह, जहां कोई नहीं हो। बस हरी-भरी पार्क हो, जंगल वाले पहाड़ की ढलान हो, नदी, समंदर की उफ़नाती लहरें हों। हम हो, 'वो' हो और साथ में गिटार। हम गाते जाएं, बजाते जाएं और 'वो' सुनती रहे! शायद इसी कारण से पूरी दुनिया के युवाओं में गिटार जितना क्रेज़ है, उसकी दूसरी कोई सानी नहीं।

लेकिन इतना जान लीजिए, लड़की से दोस्ती कर लेना चुटकी का खेल हो सकता है। जबकि गिटार सीखने के लिए महीनों कम पड़ जाएंगे। इसे सीखने के शुरुआती दिन भी कम कष्ट से भरे नहीं होते। रियाज़ के दरम्यान स्ट्रिंग्स (तारों) को दबाने से, बाएं हाथ की चार अंगलियां (अंगूठा को छोड़कर) उपरी भाग घिस जाता है। किसी किसी की अंगलियों में तो फटकर खून भी निकल जाता है। उनमें गड्ढे पड़ने से काले व बदसूरत दिखने लिखते हैं। और इसका दर्द तो कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है।

लड़कियों को रिझाने वाली बात में यह भी गौर करने लायक है। दो जोड़ों में परस्पर प्यार तभी उमड़ता है। जब दोनों के ही मन में ऑक्सिटॉक्सिन और डोपामाइन हार्मोन का स्राव हो। इसका सूरत और सीरत से कोई वास्ता नहीं होता। उसी तरह आपके भीतर संगीत नहीं है, तो लाख हाथ-पांव मारते रह जाइएगा। कुछ भी पल्ले नहीं पड़ेगा, निराशा ही हाथ लगेगी। अंत में वहीं बात हो जाएगी, न तो ख़ुदा मिला न विसाले सनम! और जितने भी माहिर म्यूजिशियन हैं, उनका यहीं अनुभव है।

आप किसी एक वाद्य यंत्र में पारंगत हों तो अन्य म्यूजिकल इंस्ट्रुमेंट बजाना भी आपके लिए आसान हो जाते हैं। बता दें कि गिटार का अविष्कार 17वीं सदी में स्पेन में हुआ था। और 18वीं सदी में ब्रिटेन के युवाओं पर यह छा गया था। गिटार दो तरह के होते हैं, हवाईयन और स्पेनिश। हवाईयन में ठहराव होता है। इससे क्लासिकल सांग्स बजाए जा सकते हैं। लेकिन परेशानी ये है कि इसे पोर्टेबल रखकर बजाना पड़ता है। जबकि स्पेनिश की धुन में ठहराव नहीं होने के बावजूद मोबिलिटी है। बिना किसी सहारे के कोई भी, कहीं भी खड़े होकर कॉर्ड बजाते हुए गा सकता है।

यह लकड़ी से बना होता है जिसमें मोटे-पतले नायलॉन के छह स्ट्रिंग (तार) लगे होते हैं। इन्हें ट्यून करने के लिए छह घुंडीया भी लगी होती हैं। इसकी कीमत चार हजार से लेकर 50 हजार रुपए तक होती है। शुरुआत में सीखने के लिए चार हजार रुपए वाला एकॉस्टिक गिटार ही मुफ़ीद रहता है। इस पर अच्छे से कॉर्ड बजाया जा सकता है। सीखने के बाद ग्रुप परफॉर्मेंस या म्यूजिक कंपोज के दौरान लीड, बेस और रिदम बजाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक गिटार लिया जा सकेता है। जहां तक सीखने का सवाल है, यदि कोई पहले से किसी एक वाद्य यंत्र को बजाना नहीं जानता। उसे बुनियादी चीजें समझने में थोड़ा समय लगता है।

हां एक बात और, ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ानी या हाथों में लेकर फ़ोटो खिंचानी हो तो अलग बात है। लेकिन सही मायने यदि सीखने की ललक है। तो एक पुरानी कहावत है, "जल पियो छानकर, गुरू करो जानकर!" संगीत का गुरु उसी को बनाइए जिसका ध्यान आपके पॉकेट से ज़्यादा सिखाने पर हो। भले ही मीठा-मीठा नहीं बोलकर डांटने वाले हों। देश की किसी भी छोटे-बड़े शहर में ऐसे गुरुओं की संख्या भले ही कम है। लेकिन ढूंढने से तो भगवान भी..!

©️श्रीकांत सौरभ (पढ़ाई के लिए पटना प्रवास के दौरान शुरुआती दिनों में वाद्य यंत्र सीखने का प्रशिक्षण लिया। योग्य गुरु के सान्निध्य में महीनों तक तमाम प्रयास के बावजूद ख़ुद से धुनें निकालने का हुनर नहीं सीख पाया। इतना जरूर था कि संगीत की बुनियादी समझ आ गई। बचपन से तमन्ना रही इस क्षेत्र में कुछ अच्छा करने की। लेकिन नियति ने लेखक बना दिया।)


वो जेठ की तपती दुपहरी, नहर में डुबकी लगाना और गाछी का आम तोड़कर खाना!

जंगल जंगल बात चली है पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है..! वर्ष 1990 का दशक, यानी एक ऐसा दौर जिसके आस-पास जन्मे लोग, कई सारे बदलाव का गवाह हैं। चीजों का मैन्युअल से डिजिटल होने का साक्षी भी हैं। तब टीवी पर काका जी कहिन, मालगुड़ी डेज, व्योमकेश बख्शी, तलाश, नीम का पेड़, रामायण, महाभारत, चित्रहार रंगोली, द सोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान, आलिफ़ लैला, कृष्णा,चंद्रकांता जैसी धारावाहिकों से शुरू हुआ सफ़र शक्तिमान, स्वाभिमान और शांति पर आकर ठहर गया था। क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बुजुर्ग सभी इन कार्यक्रमों के दीवाने थे।

गाने आंखों से नहीं कानों के रास्ते सीधे दिल में उतरते थे। यानी म्यूजिक देखने नहीं सुनने की चीज़ थी। मो. अजीज, पूर्णिमा, साधना सरगम, कविता कृष्णमूर्ति, नीतिन मुकेश, शब्बीर कुमार और अमित कुमार जैसे नकियाते सिंगर्स की गायिकी के दिन लद चले थे। और अलका याग्निक, कुमार शानू, उदित नारायण, सोनू निगम, अनुराधा पौडवाल इंट्री के साथ ही धमाल मचा रहे थे। मड़ई, घर या फुस का दालान हो, चौक-चौराहे की पान दुकान, बस या अन्य सवारियों की यात्रा हो। या फिर किसी के दरवाजे पर मांगलिक आयोजन।

टेप में कैसेट लगाकर फिल्मी गाने साउंड बॉक्स या एम्पलीफायर से बजते। तो सुनने वाले उसी में खो जाते। अधिकांश लड़के गाने गुनगुनाते हुए रोमांटिक हो जाते। और कुछ देर के लिए ख़ुद को सलमान, गोविंदा, शाहरुख, आमिर खान ही समझने लगते। बप्पी लहरी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आरडी वर्मन की चिरपरिचित धुनों के खात्मे के साथ ही नदीम श्रवण और जतिन ललित की सदाबहार जोड़ी ने म्यूजिक इंडस्ट्री को एक नया आयाम दिया था, धाचिक धाना बीट और मेलोडी म्यूजिक के साथ। 15-20 रुपए में मिलते थे टिप्स, टी सीरीज, वीनस, एचएमवी के रील वाले ऑडियो कैसेट्स। उनके कवर पर कलाकारों को निहारना भी अलहदा सुख देता था।

उन दिनों लोगों में पत्र-पत्रिकाओं को सिरहाने छुपाकर, चाट-चाटकर पढ़ने का जुनून था। किसी के लिए नंदन, बालहंस, चंपक, क्रिकेट सम्राट, तो किसी के लिए सरस सलिल, मायापुरी, मनोहर कहानियां, मधुर कथाएं, सरिता, माया, इंडिया टुडे और किसी लिए प्रेमचन्द्र, शरतचन्द्र, कुशवाहाकांत से लेकर वेदप्रकाश शर्मा, केशव पंडित के उपन्यासों को पढ़ना ही, अव्वल दर्जे का साहित्यिक अध्ययन था। इया, दादी या नानी की रातों की कहानियों में भी परियों या भूत-प्रेत का ही बसेरा रहता।

बेरहम वक्त के थपेड़ों से भले ही हम सब कुछ भूल जाएं। लेकिन इस काल में बिहार व उत्तरप्रदेश के गांवों में जन्म लिए, पले-बढ़े लौंडे कुछ चीजों को मरते दम तक नहीं भुला सकते। रह-रहकर याद आ ही जाती है, बचपन से लेकर किशोरपन के शैतानियों की। चारा मशीन से पुआल काटने की, गिल्ली-डंडा, गोली (कंचे), कब्बडी, लट्टू नचाने, लंगड़ी-बिच्छी खेलने की, स्कूल से भागकर लवंडा नाच या वीसीपी से रंगीन टीवी पर चल रही फ़िल्म देखने की, बदन को झुलसाती जेठ की दुपहरी में तपती सड़क पर नंगे पैर घूमने की, पापा के पॉकेट से सिक्के चुराकर अशोक जलजीरा, संगम आंवला पाचक या शिखर, मधु गुटखा खरीदकर चाटने या फांकने की, पेड़ से जामुन और लीची तोड़कर खाने की।

बगीचे में जाकर आम तोड़कर खाने के इतने किस्से हैं कि शायद एक पारी में उसे समेटा ना जा सके। रोहिणी नक्षत्र उतरते ही बीजू और जर्दा आम पकने लगते। इन दिनों गर्मियों की छुटियां भी हो जातीं। कोई सोनू पटना से, कोई विनीत दिल्ली से, कोई चुन्नू मोतिहारी से तो भोलू बेतिया से आता, छुट्टी बिताने। गांव किसी का घर, किसी के लिए ममहर तो किसी के लिए फुफहर होता। जब हमउम्र बच्चों की चंडाल चौकड़ी नहर में डुबकी लगाती। ग़ज़ब की धूम मचती। कोई सांस रोके मिनट तक पानी में छुप जाता। कोई तैरते हुए तेज धार को पछाड़ इस पार से उस पार आता-जाता। तो कोई किनारे ही कमर भर पानी में खड़े होकर तैरने की ट्रेनिंग लेता।

यहां के बाद अगला पड़ाव गाछी में होता। जहां बातों का अंतहीन सिलसिला चल पड़ता। जितने मुंह उतनी बतकही। उनमें हक़ीकत कम फ़साना ज़्यादा रहता। वीडियोगेम, वाकमैन, नागराज, चाचा चौधरी के अगले कॉमिक्स, शक्तिमान के किलवीस, गंगाधर, सुपरमैन की बातें होतीं। वहीं कभी-कभी मनोरंजन के लिए हिंदी, भोजपुरी गाने गाते हुए सभी झूमने लगते। दोल्हा-पाती, लूडो, शतरंज, व्यापार या ताश खेलकर टाइम पास किया जाता।

इसी बीच कोई लड़का सेनुरखा बीजू, जर्दा, सबुजा (चौसा) या डंका (मालदह) आम के पेड़ पर चढ़कर डाढ़ी हिलाता। फिर 'गछपक आम' भहराकर गिरने लगते। जिन्हें चूसकर-चूसकर सबका पेट भर जाता। हाथ धोने के लिए घड़े में पानी भरकर लाया जाता। कच्चे आम का 'भांजा' भी ख़ूब बनता। आम को ब्लेड से छीलकर महीने टुकड़े में काटा जाता। फिर उसे सूती कपड़े के टुकड़े में रख उसमें हरी मिर्च, आचार डालकर मुट्ठी से पकड़कर बांध लेते। और उसे पेड़ के तने पर जोर-जोर से पटकते। इसके बाद सभी बच्चे मिल-बंटकर चटखारे लेकर खाते। जिसके तेज खट्टे स्वाद को याद कर आज भी मुंह पानी से भर जाता है।

खैर, गांव अभी भी हैं। हर साल गर्मी की छुटियां भी आती हैं। लेकिन आज के बच्चों में ना तो वो उमंगें हैं। ना ही उतनी संख्या में बगीचे बचे हैं। पहले की तरह इस पीढ़ी को आज़ादी भी नहीं मिल पाती। नहर, पोखर, नदी आदि नई पीढ़ी के लिए महज़ प्राकृतिक जल स्रोत भर हैं। चारों तरफ़ हाइजीन का ढिंढ़ोरा पीटा जा रहा है। इस लिहाज़ से कान्वेंट में पढनेववाले बच्चों के लिए उसमें नहाना तो दूर की बात है। उसमें पैर भी नहीं रखना चाहेंगे।

फिटनेस के लिए आउटडोर गेम के नाम पर कहीं-कहीं क्रिकेट खेलते बच्चे जरूर दिख जाते हैं। लेकिन अब ज़्यादातर इनडोर गेम का चलन है। मोबाइल में पबजी, टिकटोक, विगो का आंनद ले रही, और फ़ास्ट फ़ूड के सेवन से शरीर को बेडौल करती पीढ़ी क्या जानें। तकनीकी किसी कदर उनसे मासूमियत, रचनात्मकता, मौलिकता, सृजनात्मकता छीनकर, उन्हें एकांकी, हिंसक, जिद्दी और गुस्सैल बना रही है। उनमें तनाव और अवसाद भर रही है। प्रकृति से कटकर कृत्रिम जीवनशैली अपनाने से, उनका शारीरिक व मानसिक स्तर पर जो नुकसान हो रहा है। उसकी भरपाई शायद ही हो पाए।

©️®️श्रीकांत सौरभ


26 May, 2020

"मम्मी उठ$ना स्टेशन आ गइल अपना घरे चलल जाव"

"ननकी ये ननकी, आंखि काहे नइखी खोलत रे बबुआ!", लालमती देवी ने बच्चे को दो-तीन बार झकझोरा। कोई सुगबुगाहट नहीं देख पति से बोली, "ये जी सुन$ तानी। ननकी के देखीं ना का भइल बा?"

उपर वाले बर्थ पर लेटे पति ने भन्नाते हुए कहा, "ओह! बुझाता तु हमरा के सुते ना देबू। जब नींद लाग$ता बोलके जगा देत बाड़ू।" और फिर से वह झपकी लेने लगा।

लॉकडाउन को लेकर प्रवासियों का पलायन चरम पर था। इसी क्रम में मजदूरों को लेकर लुधियाना से चंपारण जा रही स्पेशल ट्रेन पूरी रफ़्तार में थी। रात के 11 बजने वाले थे। एक तो जेठ का महीना होने के कारण भारी उमस थी। उस पर पंखा भी आग उगल रहा था। दूसरे, पेट में 24 घंटे से अन्न का एक भी निवाला नहीं जाने का कारण यात्रियों की नींद आंखों से कोसों दूर थी। ट्रेन के डिब्बे में किसी तरह लोग करवटें बदल कर अपनी मंजिल का इंतजार कर रहे थे।

पत्नी को दुबारा चिल्लाते देख हरिहर हड़बड़ाहट में बर्थ से नीचे उतरा। अंजाने डर से उसका कलेजा जोरों से धड़कने लगा था। उसने भी बेटे के चेहरे को दाहिने-बाएं हिलाया, सोनुआ ये सोनुआ, उठ ना रे बबुओ!'

मां ने गोद में बैठे बच्चे को ममतामयी नजरों से निहारा। उसका खाली पेट भीतर तक धंस चुका था। अर्ध बेहोशी की हालत में अबकी बच्चे ने पपनी झपकाते हुए आंखें खोली। थोड़ी देर तक शून्य में निहारता रहा, फिर मूंद ली। लालमती ने झोले से पानी की बोतल निकाली जो कि गर्म हो चली थी। बोतल का कॉक खोला और अंजुरी में थोड़ा सा पानी लेकर उसके मुंह पर छींटे मारा।

"मां दूध पिया द। बड़ी भूख लागल बा", उसने अंघियाए हुए रुंधे गले से कहा। मालूम पड़ रहा था, बच्चा सोते से अचानक जागा हो। यह सुनते ही लालमती ने तेजी से ब्लाउज के बटन खोला। और उसे सीने से लगाकर दूध पिलाने लगी। बच्चा धीरे-धीरे मुंह चुभलाने लगा।

"हे छठी माई, का जाने किसमत में का लिखल बा! केहु तरे हमनी के ठीकठाक घरे पहुंचा दिही। असो छठी घाटे चउबिसा कोसी भरेम जा।", बेटे के शरीर में हलचल देख वह मन ही मन मन्नत मांगने लगी। वैसे सुबह से लेकर रात तक वह भंगहा, मदनपुर के देवी माई, गांव के ब्रह्म बाबा, डिह बाबा, जिन बाबा जैसे कितने देवता-पितरों के नाम पर भखौती भाख चुकी थी। उसे खुद ही याद नहीं रही होगी।

जबकि सूखकर ठठरी पड़ चुकी उसकी छाती से दूध तो कब का निकलना बंद हो चुका था। दो महीना हो भी तो गया था ढंग से खाए हुए। पति का रेहड़ी पर घुमाकर सब्जी बेंचने का काम बिल्कुल ठप था। घर में राशन नाम मात्र के बचे थे। भंडारे और लंगर की कभी-कभार मिलने वाले रोटी व राजमा चने की सब्जियों के सहारे जिंदगी काटनी मुश्किल थी। रूम रेंट को लेकर मालिक ने भी अब दबाव बनाना शुरू कर दिया था।

दूसरों के देखा-देखी वे भी दो महीने से गांव लौटने का प्लान बना रहे थे। लेकिन पति, पत्नी का छह साल की बेटी और तीन साल के बेटे को लेकर लुधियाना से बेतिया आना, वह भी पैदल चलकर। परिणाम सोचकर ही हिम्मत जवाब दे देती थी। इसी बीच मालूम हुआ कि मजदूरों के लौटने के लिए स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है। टिकट बुक हुआ, एक सप्ताह बाद का नम्बर मिला। वे सपरिवार चल दिए।

"मां दुधवा आवते नइखे मुंह में..!" यह सुनकर दुविधाओं में घिरी लालमती का ध्यान उसकी ओर गया। उसने देखा, बोलकर बेटा फिर से अचेत हो गया था।

बगल में बैठी बेटी झुनिया ने दूध पिलाई थमाते हुए कहा, "मां गुड्डू के पिला द। हम एहि तरे सह लेम पानी पी पीके!" झुनिया गुड्डू से तीन वर्ष बड़ी थी। अब थोड़ी समझदार हो चली थी। उसे छोटे भाई की तकलीफ़ देखी नहीं जा रही थी। लेकिन कर भी क्या सकती थी बेचारी!

मां को अवचेतन मुद्रा में देख, उसने ख़ुद ही स्नेहवश भाई के मुंह में दूध पिलाई डाल दी। बोली, "ल$ गुड्डू चीनी-पानी ह। एकरे के दूध समझिके पी ल$। घरे चलल जाई नु त दादी भइस के दूध दिहे, छाली वाला।"

दरअसल लालमती दूध की उपलब्धता नहीं होने के चलते चीनी पानी का घोल तैयार करती। और दूध पिलाई में भरकर बेटे को दे देती पीने के लिए। झुनिया भी उसी से अपना काम चला लेती। लेकिन कब तक चलता यह?

आप पढ़ रहे हैं श्रीकांत सौरभ की कहानी - लॉकडाउन

ट्रेन को चले हुए आज दो दिन बीत चुके थे। और सफ़र था कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। रास्ते में कहीं-कहीं समाजसेवी युवक ब्रेड या केला आदि थमा देते थे। लेकिन यह तीन जने के लिए नाकाफ़ी था। झुन्ना तो दूध के अलावा कुछ छूता भी नहीं था।

हरिहर ने मोबाइल में समय देखा, रात के एक बजे का समय दिखा रहा। बटन दबाते ही पिक-पिक की आवाज़ के साथ उसका स्विच ऑफ हो गया। चार्ज नहीं होने से बैटरी जवाब दे गई थी। तभी लगातार हॉर्न बजाती ट्रेन की रफ़्तार धीमी होने लगी। गाड़ी एक बड़े स्टेशन पर आकर रुकी थी। उसने खिड़की से झांककर जगह का अंदाजा लगाना चाहा।

लाउड स्पीकर से बोला जा रहा था, "यात्रीगण कृप्या ध्यान दें। लुधियाना से चलकर चम्पारण को जाने वाली स्पेशल एक्सप्रेस ट्रेन बदले रूट के कारण भोपाल स्टेशन पर पहुंची है। यहां से ट्रेन अब गंतव्य के लिए प्रस्थान कर रही है। असुविधा के लिए हमें बेहद खेद है।" लेकिन उद्घोषक द्वारा बोला गया अंतिम वाक्य, "आपकी यात्रा मंगलमय हो!" जैसे यात्रियों को चिढ़ाते लग रहा था।

इधर, बेटे में कोई हरकत नहीं देख लालमती बेटी से बोली, "बबी रे, तोरे राखीं बान्हे ला गढ़ी माई से एकरा के मंगले रहनी। अब देही में नइखे ई। आई हो दादा... दूध बिनु मु गइल हमार करेजा के टुक्का..!", यह कहते हुए वह पुक्का फाड़कर रोने लगी और गश खाकर सीट पर निढ़ाल हो गई।

उसके विलाप से पूरी बोगी ग़मगीन हुए जा रही थी। लेकिन बगल से कोई भी यात्री झांकने तक नहीं आया। सामने बैठे दो यात्री भी अपने बर्थ पर दमी साधे लेटे हुए थे। आख़िर कोई ख़ैरियत पूछता भी कैसे। कोरोना का डर था ही, भूखे व गर्मी से भी सबकी स्थिति दयनीय हो चली थी।

वहीं हरा सिग्नल मिलते ही हॉर्न देकर ट्रेन हल्के धक्के के साथ चल पड़ी। रेंगते हुए कुछ ही देर में उसने तेज रफ़्तार पकड़ ली। इतनी कि सबको पीछे छोड़ते हुए बस भागे जा रही थी, छिटपुट स्टेशनों पर रुकते हुए। भले ही वह हर जगह नहीं रुकती थी। लेकिन परेशानी ये थी कि जहां रुकती वहां पांच-पांच घंटे खड़ी रह जाती। बिल्कुल आशाहीन हो गई थी।

इस तरह दो दिन और चलने के बाद पांचवें दिन सुबह में ट्रेन बेतिया पहुंची। स्टेशन पर उतरे लोगों को जांच कराने के बाद क्वारेंटाइन केंद्रों में पहुंचने की जल्दी थी। जबकि प्लेटफॉर्म पर दो-तीन तीन जगहों से लोगों की चीत्कार उठ रही थी। इस हृदयस्पर्शी दृश्य से उपस्थित रेलकर्मियों और पत्रकारों की आंखें नम हो चली थीं।

मुख्य गेट के पास ही हरहिर, लालमती और झुनिया बच्चे के शव के पास बिलख रहे थे। थोड़ी दूर आगे एक जवान मुस्लिम विधवा का शव रखा था। वह ईद मनाने घर आ रही थी, लेकिन पहले से ही बीमार थी। शायद गर्मी और भूख सहन नहीं कर पाई थी।

इससे बेख़बर उसकी दो छोटी-छोटी अबोध बेटियां, शव पर डाली गई चादरों को हवा में उड़ाकर खेल रही थीं। पिता के साये से पहले ही महरूम हो चुकी इन अभागियों का क्या पता था कि मां अब इस दुनिया में नहीं है। वह किसी किसी तरह यहां तक तो लेकर आ गई थी। लेकिन अब उनके शव को घर लेकर कौन लेकर जाएगा?

तभी छोटी बेटी शव पर लोटाते हुए कहने लगी, "मम्मी उठ$ना मम्मी, हमनी के स्टेशन आ गइल। अब घरे चलल जाव।" यह देख रेलवेकर्मी समेत अन्य यात्रियों की आंखों से आंसू की बूंदें लुढ़क पड़ी। मीडियाकर्मी भी विचलित हो गए। अगले दिन सभी अखबारों में यह ख़बर प्रमुखता से छपी थी, "प्रवासी मजदूरों को लेकर आ रही स्पेशल ट्रेन में भूख से दो मरे"

©️®️श्रीकांत सौरभ (नोट - यह कहानी, पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें ज़िक्र किए गए जगहों और पात्रों के नाम की, किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता संयोग मात्र कही जाएगी।)


24 May, 2020

जबसे चढ़ल बइसखवा ये राजा चुए लागल..!

वर्ष 04 में ताड़ी के बखान पर केंद्रित एक भोजपुरी फ़िल्म का यह गाना काफ़ी हिट हुआ था। लिहाज़ा बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में ताड़ी का आज भी उतना ही क्रेज़ है। बैशाख व जेठ (अप्रैल से जुलाई) के महीने में ताड़ी भरपूर मात्रा में निकलने लगती है। और पश्चिमी यूपी व बिहार के देहात में मजदूरों के लिए जश्न मनाने का समय होता है। सूबे में शराबबंदी के बावजूद इसका महत्व कम नहीं हुआ है। सस्ती तो है ही आसानी से हर जगह मिल भी जाती है। 

गेंहू की फसलें कटने के बाद मजदूर खलिहर हो जाते हैं। इस मौसम में सूरज की सीधी धूप से गर्मी का प्रकोप बढ़ जाता है। ऐसे में मजदूरों को दो तीन बट्टा (ग्लास) मारकर किसी पेड़ की छाह में सुस्ताते देखा जा सकता है।

तभी तो वर्ष के नौ महीने नशा से दूर रहने वाले अधेड़ खदेरन, सुबह-सुबह जब बइसाखा चढ़ाकर घर आते हैं। तो मेहरारू को रोमांटिक मूड में कहते हैं, "झुनुआ के माई सुन$ तारु हो। असो छोटका के बियाह में तोहरा खातिर पियोर सिलिक के साड़ी किन ले आएम!" और वह मुंह बिचकाते कहती हैं, "बुझात सुबेरे सुबेरे नासा चढ़ी गइल बा कपार प। 25 बरिस भइल बिअहला, हमार हिया जुड़ा दिहनीं। अब फ़लाना बाबू बनल बानी।"

इन दिनों आदमी कौन कहे, कौवे तक नशे में झूमते हुए उड़ते हैं। खुमारी में किसी के सिर पर चोंच से ठोकर मारकर ज़ख्मी भी कर देते हैं। ताड़ी ताड़ और खजूर दोनों के पेड़ से निकलती है। ताड़ की ताड़ी ज्यादा मात्रा में निकलती है। लेकिन खजूर जितनी मीठी और गाढ़ी नहीं होती। 

यह भी कहा जाता है कि सूर्यास्त के समय लबनी टांग दी जाए। और अहले भिनसार में उतारा जाए तो पीने पर गुलाबी नशा छाता है। जिसके सेवन से महीने भर में कोई भी बॉडी-बिल्डर बन जाएगा। जबकि धूप लगने से उसमें खट्टापन और नशा दोनों ही बढ़ता है।

ताड़ी पीने वाले के पसीने से अजीब तरह की गंध आती है। इसलिए हर कोई नहीं पीता। लेकिन कुछ शौक़ीन बताते हैं कि ताड़ी के ताज़े रस में कोई गंध नहीं होती। लबनी की सफ़ाई सही तरह नहीं करने से बदबू मारने लगती है। दक्षिण भारत ताड़ी से शक्कर गुड़ भी बनता है। यह औषधीय काम में आता है। और महंगा होता है। 

अमिताभ बच्चन वाली पुरानी फ़िल्म 'सौदागर' तो पूरी तरह से इसी थीम पर आधारित है। किसी समय राजधानी पटना के चुनिंदे रेस्टोरेंटस में फ्रीज में रखकर ताड़ी बिकती थी। जो फ़िल्ट्राइज़ कर बोतल में गुलाब जल डालकर रखी रहती थी। हालांकि इन दिनों पासियों (ताड़ी छेने वाले) की कमी के चलते इसकी पर्याप्त उपलब्धता नहीं हो पाती।

ज़्यादा मुनाफ़े के लिए विक्रेता उसमें 'देशी, छोवा, चुअउआ' की मिलावट धड़ल्ले से कर रहे हैं। इसमें तेज नशा होता है। लेकिन यह किसी की भी सेहत के लिए जबर्दस्त नुकसानदायक है। बावजूद इसके मजदूरों को इससे क्या फ़र्क पड़ता है। वे तो कहते नहीं अघाते कि दिन भर इतनी मेहनत से पसीने बहाते हैं। रात में पीकर सोने से थकान दूर होती ही है। नींद भी ख़ूब आती है। यानी स्वास्थ्य की परवाह किसे है। उन्हें तो बस मादकता चाहिए होती है।

©️®️श्रीकांत सौरभ


22 May, 2020

सड़कों पर कोरोना संक्रमित खांसते, छींकते, बुखार में तपते और लुढ़कते नज़र आने लगे तो...

पानी वाला दूध! पतली दाल! मोटे चावल का भात! आलू की बेस्वाद झोलदार सब्जी! एक कमरे में जरूरत से ज़्यादा लोगों का ठूस-ठूसकर रहना! 100 से 150 लोगों के लिए महज़ दो-तीन शौचालय का होना! आधे से ज़्यादा लोगों का खुले में शौच के लिए जाना! और बेतरतीब ढंग से मास्क लगाए या गमछा से मुंह ढके मजदूरों का, साथ बैठकर ताश खेलना या गप्पे लड़ाना!

ये नज़ारा आम हो चला है बिहार के अधिकांश क्वारेंटाइन केंद्रों पर। हलांकि कई जगह अच्छी सुविधा भी दी जा रही है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। फिर भी सरकार लाख दावा कर ले। मीडिया का केंद्रों पर जाकर रिपोर्टिंग करना प्रतिबंधित कर दे। लेकिन इस वक़्त की यहीं कड़वी सच्चाई है। जहां एक तरफ बचाव के लिए तमाम तरह के सुविधाएं बहाल की जा रही हैं। वहीं मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं हो पाना कुव्यवस्था को जन्म देती है। ये सबसे बड़ी 'बाधा' भी है, कोरोना वायरस से निपटने की लड़ाई में।

हालांकि मैंने अभी तक जेल फिल्मों में ही देखा है। लेकिन इतना जरूर यक़ीन है। यहां से संतोषजनक हालत वहां की जरूर रहती होगी। जिन क्वारेंटाइन केंद्रों पर कोरोना पॉजिटिव मरीज मिल रहे हैं। उसके अहाते में कोई भी बड़ा अधिकारी नहीं जाना चाहता। जबकि सुबह-शाम खाना बनाकर खिलाने वाले रसोइया हों। मजदूरों की 24 घंटे तीमारदारी में लगे शिक्षक, अन्य कर्मी हों। या फिर 'जुगाड़' से केंद्रों का संचालन कर रहे 'साहब' के खास 'मौसम वैज्ञानिक' (बिचौलिए) हों। किसी के पास सुरक्षा किट (पीआईपी) नहीं है।

कहीं-कहीं तो एक अदद स्तरीय मास्क भी मुहैया नहीं है। फिर भी अपनी रिस्क पर, किसी को अवसर को फायदा में बदलकर पैसे कमाने की फ़िक्र है। तो किसी को नौकरी बचाने की चिंता खाए जा रही है। क्योंकि कोई भी अनहोनी हो जाए तो कार्रवाई की गाज, निचले स्तर के कर्मियों पर ही गिरती है। बड़ा सवाल यह भी उठता है कि इतनी कुव्यवस्था के बीच क्या कोरोना का चैन टूट पाएगा?

अब तो गांवों की स्थिति ये हो चली है कि क्वारेंटाइन केंद्रों पर जगह ही नहीं बची। मामूली जांच के बाद डॉक्टर उन्हें (बाहर से आए मजदूरों को) घर पर ही 14 दिनों तक क्वारेंटाइन में रहने की सलाह दे रहे हैं। जबकि ग्रामीण बाहर से आए अपने ही परिजन, पड़ोसी को रखने के लिए तैयार नहीं। कुछ परिजन स्नेह के चलते जहां अपने लाडले को रख ले रहे हैं। वहीं कड़े विरोध के कारण बहुत से मजदूरों को गांव के स्कूलों में अपनी व्यवस्था से रहना पड़ रहा है। इस सबके बीच सोशल डिस्टेंस की धज्जियां उड़ रही है।

ज़्यादातर क्वारेंटाइन केंद्र ऐसे हैं। जहां रहने-खाने को लेकर रोज़-रोज़ नए लफड़े हो रहे हैं। खाना का समय पर नहीं मिलना। जब नाश्ते के मेन्यू में ही कटौती हो। और 12 - 01 बजे खाना मिले तो असंतोष बढ़ेगा ही। वैसे भी बिहारियों को नाश्ता मिले या नहीं। दो समय भरपेट भोजन चाहिए ही होता है। आए दिन वायरल वीडियो से इसका खुलासा भी हो रहा है।

ठीक है, आप कहते हैं। मुफ़्त का खाना है। मजदूरों का शांति से धैर्य बनाकर रहना चाहिए। लेकिन 14 दिन कम नहीं होते साहब, किसी जगह पर बिताने के लिए। कहीं-कहीं तो जानवरों के बाड़े से भी बदतर व्यवस्था है। आज सबके हाथ में मोबाइल है। अखबार है। लोगों में जागरूकता बढ़ी है। वे पढ़ रहे हैं कि सरकार की ओर से केंद्रों पर कौन-कौन सी सुविधा दी जा रही है।

लेकिन हक़ीकत में जब उन्हें यह सुविधा नहीं दिखाई देती। तो हक़ की मांग करेंगे ही। ऐसे में बवाल का होना लाज़िमी है। दर्द और भी कई हैं। कुव्यवस्था के कारण बहुत सारे मजदूर रात में घर चले जाते हैं। और सुबह में आकर हाज़िरी बना लेते है। इतनी बड़ी अनियमितता में कब कौन किससे संक्रमित हो जाए कहना मुश्किल है। जरूरत के हिसाब से जांच किट की उपलब्धता कितनी है। यह बात किसी से अब छुपी नहीं रही। पहले से स्थिति सुधरी तो है, लेकिन राम भरोसे वाली बात भी झुठलाई नहीं जा सकती।

12 करोड़ की बड़ी आबादी वाले इस सूबे में 534 प्रखंड और 45 हजार के आस-पास गांव हैं। 15-20 हजार के आसपास या इससे भी ज़्यादा क्वारेंटाइन केंद्र अब तक बन चुके होंगे। या बनने की राह में होंगे। ऐसे में यहां की सघन आबादी पर न्यूनतम चिकित्सकीय सुविधा। और गरीबी के साथ कोढ़ में खाज की तरह अशिक्षा पर महामारी भारी पड़ती दिख रही है। सारी चीजें मीडिया में भी छपकर नहीं आ रही।

दिल्ली, मुम्बई, गुजरात जैसे जबर्दस्त संक्रमण वाले शहरों से ट्रेनों, ट्रकों, बसों में लदकर, पैदल, साइकिल, ऑटों या अन्य माध्यम से रोज़ाना लोगों का आना। और जांच के बाद कोरोना संक्रमितों की दिन पर दिन बढ़ती संख्या। डरावने भविष्य की ओर इशारा कर रही है।

यह कि प्रवासियों की बेतहाशा बढ़ती भीड़ के चलते क्वारेंटाइन केंद्रों के फेल होने, और आइसोलेशन केंद्रों की कमी से कहीं हालात बेकाबू हो गए, जैसा कि अंदेशा है। नतीजा सोच कर ही मन डर जाता है। फ़िल्म 'ट्रेन टू बुसान' के जॉम्बियों की तरह संक्रमित लोगों का दृश्य आंखों के सामने घूमने लगता है। यदि उसी तरह सड़को पर सरे आम खांसते, छींकते, बुखार में तपते और लुढ़कते मरीज़ नज़र आने लगे। तो क्या होगा?

भगवान करें महज़ हमारी कोरी कल्पना भर साबित हो। और यह बला जल्द से जल्द टल जाए। मैं तो बस यहीं कहूंगा, जो होना है होकर रहेगा। अब घर बैठे सरकार को कोसने से कुछ नहीं होने जाने वाला। संसाधन की उपलब्धता के आधार पर जो करना चाहिए सरकार कर रही है। लॉक डाउन का पालन करते हुए सोशल डिस्टेंसिंग बरतें। सेनेटाइजर, मास्क का सही तरह से प्रयोग करें। बाहर से आने पर, भोजन करने से पहले साबुन से केहुनी तक हाथ जरूर धोएं। घर में रहें, सुरक्षित रहें!

@श्रीकांत सौरभ

13 May, 2020

संस्मरण, भाग- 01) भगवान का शुक्र है कि फुल टाइमर पत्रकार नहीं बना

सभी के जीवन में उम्र का एक ऐसा पड़ाव भी आता है। जब वह करियर के उस मुहाने पर खड़ा होता है। जहां तय करना होता है, कौन सा स्टैंड लें? हालांकि 20 प्रतिशत युवक मैट्रिक या इंटर के बाद ही अपना लक्ष्य तय कर लेते हैं। इसमें उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, सोच और सही दिशा में ली गई शिक्षा आदि चीज़ें काम आती हैं।

लेकिन तकनीकी डिग्री के बजाए कला से स्नातक करने वाले 80 प्रतिशत युवक। 'क्या करें, क्या न करें' के तर्ज पर असमंजस की मनोस्थिति से जरूर गुजरते हैं। शायद एकेडमिक पढ़ाई में औसत रहने के कारण मैं भी इन्हीं असमंजसों की जमात में शामिल था।

मोतिहारी के एमएस कॉलेज से आईएससी करने के बाद दिल्ली गया था। बीसीए करने। लेकिन वहां की आबो-हवा में मन नहीं रमा। इरादा बदल लिया। एक बात साफ कह दूं कि पापा जी के दबाव के चलते इधर-उधर की 'जुगाड़' से विज्ञान में बारहवीं कर लिया। नहीं तो साइंस से अपना छतीस का आंकड़ा रहा है। मेरे लिए गणित का मतलब जोड़, घटाव, गुणा, भाग से ज्यादा कुछ नहीं रहा। अलजबरा के समीकरण, साइन, कौस, टैन के मान और ज्यामिति की सीधी, आड़ी, तिरछी रेखाएं। जागते हुए कौन कहे, सपने में भी आकर डरा देते।

दिल्ली में आठ महीने बिताने के बाद ही पटना लौट गया। आर्ट से स्नातक कर प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए। जैसा कि इस उम्र में मेरी तरह अधिकांश युवक का सपना होता है। राजकीय या संघीय कमीशन का एंट्रेंस निकालना। खैर, वर्ष 05 में आरपीएस कॉलेज, पटना से राजनीति विज्ञान से स्नातक कर रहा था। सेकेंड ईयर की परीक्षा दी थी। पारिवारिक स्थिति चरमराने के चलते जॉब की संभावना भी तलाशने लगा।

मेरा रहना बाजार समिति के पास जय महावीर कॉलोनी कॉलोनी में होता। और राजेन्द्र नगर के एक निजी संस्थान में क्लर्क और पीओ की तैयारी कर रहा था। वर्बल, नन वर्बल रिजनिग, अंग्रेजी के सिनोनिम्स, एनोनिम्स और गणित के लॉजिक में माथा खपाना पड़ता। इतना कि इनको सुलझाते हुए खुद भी उलझते जा रहा था।

यह दौर था, जब बिहार को 'जंगल राज' की उपाधि से छुटकारा मिले महज दो वर्ष ही हुए थे। केंद्रियों नौकरियों में रेलवे और बैंक का जबर्दस्त क्रेज़ था। राज्य में सरकारी नौकरी की जल्दी वैकेंसी ही नहीं निकलती थी। कुछ निकलतीं भी तो लेटलतीफी का शिकार हो जातीं। या फिर न्यायपालिका के चौखट पर न्याय की गुहार लगाने लगतीं। बिल्कुल आज ही की तरह।

हां इतना जरूर था। सचिवालयकर्मियों से लेकर जिला, अनुमंडल व प्रखंड स्तर तक कंप्यूटर ऑपरेटर, शिक्षक नियोजन, मनरेगाकर्मियों की बहाली की प्रक्रिया जारी थी। राज्य में कोरोपोरेट सेक्टर अभी पांव पसार रहे थे, जमे नहीं थे। प्राइवेट जॉब के लिए एमबीए, एमसीए कर बड़े शहरों में जाना होता।

बता दूं कि मुझमें बचपन से ही भावुकता और संवेदनशीलता कूट-कूटकर भरी है। अनुभूति स्तर गहरा होने के चलते साहित्य, अध्यात्म और संगीत में रुचि रही है। पटना प्रवास के दौरान एक संगीतज्ञ के सान्निध्य में कई तरह के वाद्य यंत्र बजाने का प्रयास किया। कड़ी मशक्कत के बाद भी इसमें सफलता नहीं मिली। लेकिन संगीत की प्रारंभिक समझ जरूर आ गई।

उसी तरह किताबें पढ़ने का बेहद शौक़ीन आदमी रहा हूं। इतना कि कोर्स की किताबें छोड़कर सब कुछ पढ़ना मंजूर रहता। मैट्रिक तक आते-आते नंदन, क्रिकेट सम्राट, बालहंस, सरस सलिल, अखंड ज्योति, कॉमिक्स, सत्य कथा, सरिता, गृह शोभा, मनोहर कहानियां, प्रेमचंद से लेकर वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यास हों या फिर अखबार। पढ़ने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

तीन घण्टे में पन्ना दर पन्ना उपन्यास चाट डालता था, चाहे कोई भी हो। मेरा पढ़ने का स्पीड उतना ही था। जितने स्पीड में आज एंड्राइड मोबाइल पर दाएं हाथ की रिंग फिंगर चलती है। और गूगल हिंदी इनपुट से रोमन में टाइप कर देवनागरी लिख लेता हूं।

गांव में रहते हुए भी, अपने जाने नंदन का कोई अंक मिस नहीं करने का भरपूर प्रयास किया। हां, उन दिनों पैसे देकर दूसरों से मंगाना पड़ता। और मैट्रिक के बाद जब शहरों में रहना हुआ। पत्रिकाएं ही ज़िंदगी बन गईं। किताबों का चस्का ऐसा लगा कि कुछ नहीं करने की हद तक पढ़ने से दीवानगी हो गई।

उन दिनों बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन के व्हीलर पर कई तरह की किताबों और पत्रिकाओं की भरमार रहती। सजाकर या लटकाकर रखी गई उन पत्रिकाओं को घूर-घूरकर ललचाई नजरों से निहारने का अलग ही क्रेज था (इन जगहों पर पत्रिकाएं आज भी सजती हैं। लेकिन तब वाली फिलिंग नहीं आ पाती)। खरीदने के बहाने पत्रिकाओं को उठाकर सरसरी निगाहों से पलटने में ही मेरी कितनी ट्रेनें छूटी थीं।

मैंने क्या-क्या पढ़ा? यदि आप यह जानना चाहेंगे तो मेरा जवाब होगा। क्या नहीं पढा यह पूछिए? कुल जमे इतना ही समझ लीजिए। वर्ष 00 तक का दशक ही ऐसा रहा। जिन्हें पढ़ने का चस्का रहता था। वे कुछ भी नहीं छोड़ते थे। वो चाहे पुरस्कृत किताबें, लुगदी साहित्य, मस्त राम, दफा 376 जैसे पोर्न या इरोटिक डाइजेस्ट हों या फिर गीता, रामायण, सत्यार्थ प्रकाश, कुरान, बाइबल।

एक दिन मन में यूं ही ख्याल आया। क्यों नहीं पत्रकारिता की जाए? अखबार में एक मासिक क्षेत्रीय पत्रिका का विज्ञापन देखा। फ्रेजर रोड के एक अपार्टमेंट में कार्यालय था। रेंजर साइकिल की सवारी थी अपनी। चलाकर पहुंच गया। अंदर में एक अधेड़ सांवली सूरत वाले शख्स चश्मा लगाए बैठे मिले। उनसे सटे ही एक युवती बैठी थी।

चश्मे के उपर से आंखें जमाते हुए बोले, "कहिए क्या काम है?"

"पत्रकार बनना है।", मेरा जवाब था। यह सुन उन्होंने कहा, "इसके लिए आपको हमारे संस्थान से ट्रेनिंग लेनी होगी। 15 दिनों की। इसमें 1500 रुपए का खर्च आएगा। उसे आप जमा करा दे। ट्रेनिंग के बाद आपको आई कार्ड भी मिलेगा।"

उनकी बातें सुनते हुए ध्यान उनके चेहरे पर गया। बिल्कुल नपे-तुले शब्दों में बोलते हुए वे माहिर प्रोफेशनल लग रहे थे। रुपया का नाम सुनते ही मेरे दिमाग में घण्टी बजने लगी, 'गोलमाल है भाई सब गोलमाल है।' पता नहीं क्यों, उनकी सूरत देखकर ही सीरत का अंदाजा भी लगा लिया।

भले ही इस क्षेत्र में नया था। जहां के चाल, चरित्र और चेहरा से वाकिफ नहीं था। लेकिन मूर्ख तो नहीं ही था। अभी तक सुन रखा था कि काम के बदले पैसे मिलते हैं। यहां तो उल्टी स्थिति थी।

कुछ सोचकर मैंने कहा, "ठीक है। इस बावत जल्द मिलेंगे। अपने साथ रोलदार चार पन्ने पर लिखे एक आलेख को उनकी तरफ बढ़ाया।

और कहा, "देख लीजिए। लेखन सामग्री छपने लायक हो तो जगह दीजिएगा।" और वहां से मैं निकल लिया।

संस्मरण आगे भी जारी...

@श्रीकांत सौरभ (रोजी-रोटी के लिए टीईटी शिक्षक के तौर पर नियोजित हूं। ख़ुद को अपनी शर्तों पर ज़िंदगी गुजारने वाला। निहायत ही देहाती, गंवार, आलसी, वैचारिक आवारा क़िस्म का इंसान मानता हूं। किसी क्षेत्र की सेलिब्रिटी नहीं हूं, जिससे मेरा संस्मरण पढ़कर कोई प्रेरित हो सके।)


10 May, 2020

मदर्स डे प एगो माई के नामे बुरबक बेटा के चिट्ठी

मां,

गोड़ छूके गोड़ लाग$ तानी!!!

पाता बा आजु 'मदर्स डे' ह! सभे केहु इयाद करता अपना माई के। मने हम भुलाइल कब रहनी ह तोहरा के, जे इयाद करती। हमनी के भले बिलाला निहर छोड़िके चली गइलू। बाकिर का बताई कि कब बिसरेलु। सभे ओरी त लउकबे करेलू। आम-मारचा के आचार, सरसो-बथुआ के साग में! मकर सक्रंति के लाई-तिलुआ में! छठी घाट के गवनई-अरघ में! जिउतिया के नहान-कथा में! होली के रंग-अबीर में! दीवाली के दियरी-बाती में! चुमावन, मटकोरा, परिछावन, बियाह के भोजपुरी गीतन, सोहर, लाचारी में! लइकन के कोरा खेलावत कवनो माई के अंचरा में!

ई कुल्ही मोका प कबो-कबो रोआई भी आ जाला। मने आंखि के लोर पोछके छुपा लेवेनी। तुही नु कहत रहलू, मरद के दिल रोयेला, आंखि ना। एहि से सोचनी ह एगो चिठिए लिखी दिहीं। पूरे तीन बरिस हो जाई तोहरा गइला। 16 मई के ए दुनिया से विदा भइल रहलू, 27 बरिस ले बेमारी से लड़त-लड़त। दवाई आ बीमारी में खूबे लड़ाई भइल। एगो मुए ना देत रहे, एगो कहे संगही लेके जाएम। एह दुनु के बलजोरी में तोहार देही जरजर हो गइल रहे। बस एतने कहब मरी-मरिके जियत रहलु।

पहिले हार्ट, फेरु सुगर के बेमारी। ओकरा बाद किडनी फेल हो गइल। तबहु संतान के मोह अनघा कष्ट प भारी रहे। तोहरा अबही जाए के मन रहे कहवां। मरे के दु बरिस पहिले से पूरा देही सूज गइल रहे! यूरिन निकलल बन हो गइल! सांस ना लिहल जाए! आ फेरु कोमा में अनंतकाल ला चली गइलू! अंचरा के छाही मिटल आ ममता के मंदिर टूटी गइल! भगवान दुश्मनो के वइसन मवत ना देस! पापा जी के मरला के बाद, घर के एगो बरियार आधार स्तम्भ ढही गइल।

छोटकी बेटी के बियाह, नाती आ छोटका पोता के मुंह ना देख पवलु। हमरा से तोहरा ढेर सिकुआ-सिकायत रहे। तोहरा जिनगी के अंतिम आठ बरिस ले संगे बितवनी। अपना से जइसे बुझाइल, सेवा में तोहरा कोर कसर ना छोड़नी। बाकी जवन चतुर-चालाक बेटा दूर रहेला ओकरा में ना। जवन बुरबकवा बेटा लगे रहेला। नीमन-बेजाए जइसे होखे, सहजोग करेला। गारजियन के ओकरे में ढेर कमी लउकेला, इहो सांच बा।

आउर सब ठीक बा! मने जब तुही नइखू त खाक ठीक बा! तोहरा दया से बेटा-पतोह, पोती-पोता सभे स्वस्थ बा। गुनगुन पांच बरिस के हो गइली। असो नर्सरी में चली जइहे। पोता कुंज भी चार बरिस के भइले। एलकेजी में नाम लिखाई। गुनगुन के तोहर चेहरा इयाद बा। कहेली कि दादी मु गइली। आ कुंज से पूछल जाला त कहेले कि दादी भगवान किहां गइल बाड़ी। आछा त एतने रहे दे तानी। लॉक डाउन में सभे कोई फंसल बा। कोरोना से बाचेम त अगिला बरिस फेरु एगो चिट्ठी भेजेम।

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तोहार बुरबक बेटा,

सिरिकांत