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28 January, 2022

चिट्ठी आई है, आई है...

प्यारी पिरीति,

Love you forever but miss you so much!!!

हमको पता है ई चिठी तुम कबो नहीं पढ़ पाओगी। तभियो लिख रहा हूं। आंख भारी है और मन रो रहा है तुमको इयाद करके! सन 21 का करोना लमहर दरद देकर गया है। बस एतने जान लो, सबका कुछ न कुछ जरुरे लुटाया है। 

केतना सुहागिन के माथ का सेनुर मिट गया! केहु के मां-बाप छीनकर अनाथ बना दिया! त केहु से पत्नी आ बेटा छीन लिया! केतना लोग ठीक होखला के बादो रोजे मर-मरके जी रहा है। स्टूडेंट सबके पढ़ाई नास हो गया।

एतना महंगाई के जमाना में जेकर रोजी-रोजगार चउपट हो गया! ओकर जियल भी आसान है का! हमारा तो सब ठीके जा रहा था। मने तुम्हीं न बीचे रास्ता में छोड़के चली गई! 

अब केकरा से बताए, का सुनाए, हमारा क्या उजड़ गया। बिना बंधाए जाने कवन सा रिस्ता जुड़ गया था तुमसे। 

जिनगी भर इयाद रहेगा दू मई, सन 21 का ऊ मनहूस दिन। जहिया मोतिहारी के एगो अस्पताल में तुम्हारा परान निकला था।

सात दिन के देह तोड़ बोखार के बाद तुमको घर वाले दिखाने ले गए। कोई निमुनिया बता रहा था कोई टीबी, जेतना मुंह ओतना बात। बहुते जोर से दम फुल रहा था। 

सीटी चेक में आया कि तोहार लंग्स खराब हो गया था। सबेरे भरती हुई, ऑक्सीजन लगाया गया। और रात होते-होते करोनवा तुमको भी ले उड़ा।

ख़ैर छोड़ो, जानती हो परसो ही पंजाब से आया हूं। एतना ठंडी में पछुआ बेआर हाड़ को छेद रही है। आजु तनिका धूप देखा त दखिन टोला सरेह में घूमे चल दिया। अरे घूमेंगे का, बिलाला जइसन बउरा रहे हैं। 

इहवां जेने नजर दौड़ाओ, लगता है हरिहर धरती पर पियरका चादर बिछा दिया गया है। रह-रहके मन करता है गेहूं के खेत में नुकाके बइठ जाए। फुलाइल सरसों, तीसी, मटर से जी भर बतिआए। निरहुआ के गाना, ओढ़नी के रंग पियर जादू... पर डांस करें। आ मोबाइल से एगो गारदा भिडियो बनाए, फेसबुक रील, इंस्टा पर डाले दें। 

मने भाक ! दिखाएंगे किसको। जब तुम्हीं नहीं हो त ई सब बेकारे नु है। यहीं सोंचकर रोआई आवे लगता है, एकदम से भकुआ हो गया हूं। यहीं टाली पर वाला खेत है न, जहां एक बरस पहले मिले थे। साग खोंटने के बहाने हेमवा के संगे आई थी। 

केतना सुनर लग रही थी तुम पियरका शूट में। तोहरा आ सरसों के फूल में कंपीटिशन हो गया था। समझे में नहीं आ रहा था पहले किसको निहारे!

खूब बतकही हुई था, हमनी दुनु जने में। तुम अरेराज डिग्री कॉलेज में बीए में नाम लिखवाई थी। मैंने सोनगंज इंटर हाई स्कूल से दोबारा आईए का फारम भरा था। मार्च में एक्जाम होने वाला था। 

तुमने किरिया धरा दिया था हमको, आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए। असो के फगुआ में मिलने का वादा भी था हुआ। हम एक्जाम के बाद पापा के पास लोधियाना चले गए, कम्बल फैक्ट्री में कमाने। दीदी के बियाह में महाजन का बहुते करजा चढ़ गया था। 

उहवे जिस दिन रिजल्ट आया। तहिया खराब-खराब सोचके बड़ी जोर से करेजा धुकधुका रहा था। नरसिंग बाबा का धेआन कर मोबाइक पर चेक किया। सेकेंड डिवीजन आया था। 

अबकी सोनुआ बहुते हेल्प किया पास करने में। गेस का जेतना पन्ना फाड़ कर ले गया था, सब लड़ गया।  खुशी के मारे छउकने का खेयाल आ रहा था कि तुमको इयाद कर अचानक दिल बैठ गया। 

तुमने किरिया धराया था पढ़ाई नहीं छोड़ने के लिए। इहे सोचकर लोधियाना में ही इग्नू में बीए ओनर्स में एडमिशन करा लिए। बिना अंगरेजी आ कंप्यूटर सीखे अब कवनो नोकरी में काम नहीं चलने वाला। एहि से स्पोकन कोर्स भी जॉइन कर लिया हूं। संगे-संगे भर्ब, टेंस, नाइरेशन, एमएस वर्ड, एक्सल भी चल रहा है। 

एने जहिया से गांवे आया हूं, कुछो आछा नहीं लग रहा। आंखि के सोझा हर समय तुम्हारा ही चेहरा घूमते रहता है। कबो मन करता है कि आरके सर के कोचिंग में जाकर पछिला बरेंच पर बैठ जाए। कम से कम उहां तो भेंटा जाओगी। 

त कबो सोचते हैं कि चउक पर सबेरे सात बजे खदेरना के पान दोकान पर खड़िया जाए। और तुम साइकिल से गुजरते हुए एक झलक लउक जाती। 

मने ई सब सोचल पागलपने नु है। जे चला जाता है ऊ लवट के कहां आता है। आ केहु के जाने से दुनिया खतम भी तो नहीं हो जाती। ई त अपनी रफ्तार में चलती रहती है। मने इहो सांच है कि जेकरा दिल पर बीतता है उहे बुझता है। बिल्कुल ई शायरी के जइसन - 

"तनहा रहल त मोह$बत करे वाला क रसम-वफा हवे

जदि फूल खुशी खातिर रहित त जनाजा प ना चढ़ित"

तुम्हारा पिरितम

©️श्रीकांत सौरभ



02 January, 2022

यकीन मानिए भोजपुरी से आप हैं, भोजपुरी आपसे नहीं

 बदलते दौर के साथ भोजपुरी इंडस्ट्री में ना जाने कितने गायक, कलाकार, अभिनेता उभरे, चमके हैं। लेकिन पवन सिंह और खेसारीलाल यादव की ठसक कुछ अलग ही है। दोनों जने का सौतिनिया डाह तो जगजाहिर है। अक्सर विवादों में पड़कर चर्चा में बने रहते हैं। वैसे कहा जाता है कि किसी अयोग्य को कम समय में दौलत व शोहरत मिल जाए तो पचा नहीं पता। 

वहीं ज्योतिषशास्त्र की मानें तो कुंडली में शुक्र ग्रह के बलवती होने से आदमी को कला के क्षेत्र में भरपूर सफलता मिलती है। लेकिन यह ग्रह रसिया (चरित्रहीन) और नशेड़ी भी बनाता है। इन विवादों के पीछे की एक वजह ये भी है। जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। भले ही पवन ने भक्ति गाने से पहचान बनाई थी और खेसारी ने 'देवरा चूसता...' गाकर। एक को हारमोनियम बजाने आता है, दूसरे को नहीं। 

लेकिन ये भी सच है कि लोक प्रचलित होने से दोनों ही कथित स्टार कहलाते हैं। जिम में अच्छी-खासी बॉडी बना लिए हैं। इनके फेसबुक व यूट्यूब पर लाखों की संख्या में व्यूअर, फैंस हैं। एक रात के स्टेज शो का लाखों रुपए लेते हैं। मुम्बई में फ्लैट, बीएमडब्ल्यू, मर्सडीज, फॉर्च्यूनर और जाने कितनी लग्जरी गाड़ियों के मालिक हैं। प्लेन से अक्सर विदेशों की यात्रा कर रहे हैं।

यहीं नहीं इन दोनों के अलावे अन्य कइयों ने भी भोजपुरी मनोरंजन के नाम पर पुरानी धुनों का रीमिक्स कॉकटेल परोसा है। लेकिन सवाल तो उठता है कि आपने सॉफ्ट पोर्न कंटेंट की आमदनी से जमाने भर का सुख हासिल तो कर लिया। बदले में आपने भोजपुरी को दिया क्या? यहीं न कि आज पढ़े-लिखे परिवारों में 'गंदी भाषा' के रूप में इसकी उपेक्षा की जाती है। देहातों तक में बच्चों को भोजपुरी में बतियाने से रोका और हिंदी के नाम पर 'अधबेसर जुबान' को बढ़ावा दिया जा रहा है। 

मिस्टर पवन, खेसारी, कल्लू, गोलू, रंगीला, रसिया आप जो भी हों, कान खोलकर सुन लीजिए। भले ही आप खुद को भोजपुरी का अलाना, फलाना स्टार मानते हैं। लेकिन सच्चाई यहीं है कि आर्केस्ट्रा में आपके फुहर पॉप पर कमर मटकाने वाला भोजपुरिया समाज घर में भोजपुरी गाना आते ही चैनल बदल देता है। मोबाइल की आवाज को कम या म्यूट कर देता है। आप जैसे कलाकारों की बदौलत ही यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक पेज व रील पर 90 प्रतिशत अश्लील भोजपुरी कंटेंट भरे पड़े हैं। जहां आपकी हैसियत एक नचनिया और लवंडा से ज्यादा की नहीं है।

यकीन रखिए, बाजार में भंजाने के लिए तैयार किए गए आपके द्विअर्थी कंटेंट समय के साथ भुला दिए जाएंगे। आपकी तमाम उपलब्धियां का, जिसमें मौलिकता है ही नहीं, किसी दिन कचरे की ढेर में जाना तय है। 

हम 20 करोड़ भोजपुरी भाषियों के पास आज भी गिनाने के लिए महेंद्र मिश्र, भिखारी ठाकुर, लक्ष्मण शाहाबादी, चित्रगुप्त, मोती बीए, शैलेन्द्र, नजीर हुसैन, मो. खलील, शारदा सिन्हा, चंदन तिवारी, भरत व्यास, गायत्री ठाकुर, विष्णु ओझा, मदन राय, गोपाल राय, शैलेन्द्र मिश्रा, अमित उपाध्याय, राहुल सांकृत्यायन जैसे दर्जनों थाती हैं। वर्षों से घर-आंगन में नानी, दादी, मां फुआ, बहनों द्वारा सामुहिक रूप में गाए जा रहे कजरी, पूर्वी, निर्गुण, सोहर, वैवाहिक नेग के गाने हैं। 

इन पर आने वाली पीढ़ी युगों-युगों तक रस्क महसूस करेगी। हमें गर्व होना चाहिए, भारत समेत दुनिया के तमाम शहरों में रोजगार के लिए प्रवास कर रहे उन हजारों कलाकारों, लेखकों, कवियों, निर्देशकों, बुद्धिजीवियों, विचारकों पर। जो अलग-अलग माध्यम से भोजपुरी की गरिमा बढ़ाने के लिए निस्वार्थ लगे हैं। मातृभाषा के विकास के लिए इनकी मुहिम एक दिन निश्चित रंग लाएगी।

©️®️श्रीकांत सौरभ



पुरानी जींस और गिटार...

चुरा लिया है तुमने जो दिल को..! दम मारो दम मिट जाए गम फिर बोलो सुबह शाम...! नीले नीले अंबर पर चांद जब आए, ऐ मेरे हमसफ़र एक ज़रा इंतज़ार..! ओ ओ जाने जाना ढूंढे तेरा दीवाना...! आंख है भरी भरी और तुम मुस्कुराने..! सन 1980 से लेकर वर्ष 00 तक के इन गानों में एक बात ख़ास है। सभी में म्यूजिक डायरेक्टर ने गिटार का भरपूर प्रयोग किया है। 

गिटार की धुन की मधुर लगती है। भले ही इसमें ठहराव नहीं होता। फिर भी इसकी आवाज़ सीधे किसी के भी रूह को छू जाती है। हर आदमी के जीवन में एक पड़ाव जरूर आता है। जब वह किसी न किसी वाद्य यंत्र की ओर आकर्षित जरूर होता है। पूरी दुनिया के युवाओं में गिटार का जितना क्रेज़ है, उसकी दूसरी कोई सानी नहीं। 

गिटार सीखने के लिए महीनों कम पड़ जाएंगे। इसे सीखने के शुरुआती दिन भी कम कष्ट से भरे नहीं होते। रियाज़ के दरम्यान स्ट्रिंग्स (तारों) को दबाने से, बाएं हाथ की चार अंगलियों (अंगूठा को छोड़कर) का उपरी भाग घिस जाता है। किसी-किसी की अंगलियों से तो फटकर खून भी निकल जाता है। उनमें गड्ढे पड़ने से काले व बदसूरत दिखने लिखते हैं।

आप किसी एक वाद्य यंत्र में पारंगत हों तो अन्य इंस्ट्रुमेंट बजाना भी आसान हो जाता है। बता दें कि गिटार का अविष्कार 17वीं सदी में स्पेन में हुआ था। जबकि 18वीं सदी में ब्रिटेन के युवाओं पर यह छा गया था। गिटार दो तरह के होते हैं, हवाईयन और स्पेनिश। 'हवाईयन' में ठहराव होता है। इससे क्लासिकल सांग्स बजाए जा सकते हैं। लेकिन परेशानी ये है कि इसे पोर्टेबल रखकर बजाना पड़ता है। 

वहीं 'स्पेनिश' की धुन में ठहराव नहीं होने के बावजूद मोबिलिटी है। बिना किसी सहारे के कोई भी, कहीं भी खड़े होकर कॉर्ड बजाते हुए गा सकता है। यह लकड़ी से बना होता है जिसमें मोटे-पतले नायलॉन के छह स्ट्रिंग (तार) लगे होते हैं। इन्हें ट्यून करने के लिए छह घुंडियां भी लगी होती हैं। इसकी कीमत चार हजार से लेकर 50 हजार रुपए तक होती है। 

शुरु में सीखने के लिए चार हजार रुपए वाला एकॉस्टिक गिटार ही मुफ़ीद रहता है। इस पर अच्छे से कॉर्ड बजाया जा सकता है। सीखने के बाद ग्रुप परफॉर्मेंस या म्यूजिक कंपोज के दौरान लीड, बेस और रिदम बजाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक गिटार लिया जा सकेता है। जहां तक सीखने का सवाल है, यदि कोई पहले से किसी एक वाद्य यंत्र को बजाना नहीं जानता। उसे बुनियादी चीजें समझने में थोड़ा समय लगता है। 

ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ानी या हाथों में लेकर फ़ोटो खिंचानी हो तो अलग बात है। लेकिन सही मायने यदि गिटार सीखने की ललक है। तो एक पुरानी कहावत है, "जल पियो छानकर, गुरू करो जानकर!" गुरु उसे ही बनाइए, जिसका ध्यान आपकी पॉकेट से ज़्यादा सिखाने पर हो। देश की किसी भी छोटे-बड़े शहर में ऐसे गुरुओं की संख्या भले ही कम है। लेकिन ढूंढने से तो भगवान भी..!

©️®️श्रीकांत सौरभ 





"बाछा आ बेटा के दूध पिआवल बांव ना जाला"

90 का दशक भुलाए नहीं भूलता। इसी दशक में बचपन और किशोरावस्था दोनों ही बीते। तब मनोरंजन महंगा लेकिन दूध सस्ता था। संयुक्त परिवार था हमारा, पूरी तरह किसानी पर आश्रित। भले ही तब मनोरंजन के साधन न के बराबर थे। लेकिन घर में दूध, दही व घी की कमी नहीं थी।

बाबा जी दरवाजे पर दो-दो भैंस पाल रखे थे। एक दूध देना बंद कर देती तो दूसरी वाली ब्याती। ईया मिट्टी के चूल्हे पर कड़ाही में दूध खौलातीं। और पझाने लिए छोड़ देतीं। थोड़ी देर में ही उसमें मोटी छाली पड़ जाती। एक बड़े ग्लास में छाली के साथ दूध पीने को मिलता। 

ईया अक्सर कहतीं, 'बाछा आ बेटा के दूध पिआवल बांव ना जाला।' ये कहने के पीछे उनकी पारंपरिक सोच थी कि दोनों ही जीव कमाने वाले होते हैं। इनसे ही गृहस्थी चलती है। 

दूध निकालने के बाद सितुआ के सहारे कड़ाही में जमी मोटी खखोरी भी निकाली जाती। हम बच्चे खूब चाव से उसका लुत्फ उठाते। स्वाद की वैसी परम् अनुभूति, आज गाय के या चलानी दूध से मिलने से रही। 

गोइठा की धीमी आंच पर नदिया में मीठा दही जमता। गंध इतनी सोंधी रहती कि चिउड़ा के साथ कोई भी एक-आध किलो दही गटक जाए। ईया सालों भर दही की छाली को एक बर्तन में इकठ्ठा करती रहतीं। फिर ‘रही’ से महकर 'लेउन' निकालतीं। 

लेउन को आग पर खौला कर ठंडा किया जाता तो घी बन जाता। इस प्रक्रिया में कड़ाही में कथई रंग की पपड़ी जम जाती। उसे 'दाढ़' कहते। खाने में कमाल का स्वाद लगता।

दुआरे पर चारा काटने, भैंसों को खिलाने लिए एक जाना रखा गया था। उसके साथ बाबा ‘लेडीकट्टा मशीन’ से चारा काटते। इस दौरान मैं भी मशीन का हैंडल साथ पकड़कर चलाता। 

यह एक तरह से जिम करने जैसा था। पूरे शरीर की कसरत हो जाती। कोई भी छह महीने लगातार मशीन चलकर चार काट ले तो सिक्स पैक एब्स बनना तय था। दोपहर में बाबा भैसों को चराने के लिए नहर की तरफ ले जाते। 

मैं भी इसी फ़िराक में रहता कि वे कब भैंस लेकर निकलें। सरेह में पहुंचते ही बाबा भैंस की पीठ पर बैठा देते। वह जब चरते हुए उबड़-खाबड़ रस्ते से गुजरती। उसकी मांसल पीठ से काफी गुदगुदी होती। 

भैंस की सवारी का वह रोमांच आज की स्कोर्पियो सरीखी लग्जरी गाड़ी में भी नहीं मिलेगा। एक दिन भैंस पर सवार मैं अपनी धुन में मगन था। बगल की झाड़ियों में कुछ खुरखुराने की आवाज आई। 

ये सुनकर भैंस उछलते हुए भागने लगी। इसी चक्कर में पगहा से मेरा हाथ छूट गया। फिर क्या था, मैं नीचे और भैंस का अगला पैर मेरे देह पर...। 

डरके मारे, अनहोनी की आशंका से आंखें बंद हो गईं। सेकेंड के सौवे हिस्से में मन में विचार आया, आज तो गया काम से। 

लेकिन गनीमत था कि उसका पिछला पैर मेरे सीने पर नहीं पड़ा। वरना परलोक सिधारने में कोई हर्ज नहीं था। मामूली चोट व खरोच आने के साथ सही-सलामत बच गया। फिर तो दोनों कान पकड़ इस मटरगश्ती से तौबा ही कर ली।

©️®️श्रीकांत सौरभ





सरसों आज भी खिलते हैं, लेकिन वो बचपन कैसे लौटे

'जरा सा झूम लूं मैं... अरे ना रे बाबा ना..!' यहीं गाना था, जिसे गाते हुए लाल फ्रॉक वाली बच्ची थिरक रही थी। पड़ोस के चाचा के यहां आई थी, जाड़े की छूट्टी में गांव घूमने। उसका परिवार मुम्बई में रहता था। मैं यहीं कोई 12 वर्ष का रहा होऊंगा। फुआ के साथ साग खोंटने सरेह वाले खेत में आया था। मक्के के खेत में बथुआ के खोंटनिहारों में जैसे होड़ सी लगी थी। मेरा काम कपड़े के झोले में साग बटोरना था।

वर्ष 95 की जनवरी की वह सर्द भरी दोपहर थी। हाड़ को छेदने वाली पछुआ ब्यार और आसमान में कुंहासे की एक महीन परत छाई थी। इनके बीच से छनकर आ रही सुनहली धूप में सरसों के पीले-पीले फूल रोमांचित किए जा रहे थे। तभी फुआ ने उस बच्ची को ओर देखते हुए कहा, 'ये लडक़ी जो गाना गा रही है। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे फिल्म का है। आजकल 'विविध भारती' रेडियो स्टेशन से इसका गाना रोज बज रहा है। फिल्म के सारे गाने हिट हैं।'

तभी फुआ ने बच्ची को पास बुलाया। बोलीं, 'बाबू आप तो बहुत अच्छा डांस करती हो। कहां से सीखा।' उसने बताया, 'डेरा पर केबल टीवी लगा है। उसी पर गाना आता है इस फिल्म का। शाहरुख और काजल को देखकर सीखती हूं। उसका जवाब सुनकर, मुझे अपने घर वाले ब्लैक एंड व्हाइट सनमाईका टीवी पर तरस आने लगा।

एंटीना लगाकर दूरदर्शन देखते थे। जिसमें गाने के कार्यक्रम के नाम पर हर बुधवार व शुक्रवार की शाम 'चित्रहार', और रविवार की सुबह में 'रंगोली' का प्रसारण होता था। चित्रहार में वर्ष 90 के पहले वाले फिल्मों के गाने तो रंगोली में 70 के दशक वाले गाने थे। चाचा व बाबा के उम्र के लोगों को तो इस कार्यक्रम में काफी रस मिलता था। लेकिन मुझे उन दिनों पुराने गाने जरा भी नहीं सुहाते थे, बस हंकला कर प्रस्तुति देती अधेड़ एंकर हेमा मालिनी को छोड़कर। शायद मेरी उम्र का तकाज़ा था।

आज भले ही ब्लैक एंड व्हाइट जमाने के साथ हंसता हुआ वो बचपन भी बीत गया। ना तो मेरे पास फुआ-बहनें हैं। ना ही बच्चों की वो हमउम्र टोली और छुटपन का रोमांच है। फिर भी जाने क्यों, हर साल खेतों में फुलाए इन सरसों के फूलों को जब भी देखता हूं। मन नॉस्टैल्जिक होकर उसी दौर में लौट जाना चाहता है। सब कुछ भुलाकर, इन्हीं खेतों में उछल-कूद मचाने के लिए। हीरो बनकर इतराने के लिए।

©️®️श्रीकांत सौरभ 





नववर्ष 2022 की पाती...

डियर 2022,

हैपी न्यू ईयर!!!

तुम्हें विश तो कल ही करना चाहता था। लेकिन हिम्मत नहीं हुई, उस मनहूस वर्ष के आखिर दिन में...। नया-नया आए हो, इसलिए तुमसे ओरहन नहीं है। लेकिन बीते दो वर्षों ने हम करोडों मनुष्यों पर जो जुलुम किया है। उसका घाव भरने में जमाना लगेगा। हमारे लोगों के साथ हुई बेरहमी की 'भतार कथा' लिखी जाए तो 'अरबियन नाइट्स' से भी बड़ी बुक का रिकॉर्ड बन जाएगा। 

खैर, तुमसे निहोरा है। आ ही गए हो तो अब शांति से रहो। आशा है कि कोरोना को 'बकोइया' चढ़ाए नहीं फिरोगे। नहीं तो डेल्टा, डेल्टा प्लस, ओमिकरोन से दिल लगाओगे तुम। और फिर से एक साल खराब होगा हमारा। 

तुमसे कहने/सुनाने को बहुत कुछ है, लेकिन मूड नहीं बन रहा। हम अबर प्राणियों पर इस बार तुम्हारी दयादृष्टि बनी रहे बस यहीं दुआ है। फिलहाल तो इसी कामना के साथ विदा लेना चाहूंगा कि...

तीन वर्षों से रजाई में नुकाके, एमबीडी गेस चाटकर भी मैट्रिक/इंटर में लटक जा रहे फेलार्थी अबकी पास हो जाएं।

फेसबुक रील/मोजो/टकाटक पर वीडियो पर वीडियो डाल रहे छिलटुओं के व्यूअर/फॉलोवर मिलियन पार हो जाए।

मनचाहे दूल्हा/दुल्हन से बियाह की आस में 35 पार हो चले लोगों के दामन में 'बसपन' का प्यार जुड़ जाए।

मैदान में दौड़ मार-मारके उकड़ रहे लौंडों की मिलिट्री में बहाली की सारी प्रक्रिया पार हो जाए।

कोरोना/फ्लोरोना का इंफेक्शन होने पर भी इसके विषाणु सर्दी के पियरका पोटे की तरह नाक से बह जाएं।

विशेष अगले साल मिलने (जीने) पर।

तुम्हारा,

श्रीकांत सौरभ