सबसे अच्छा कंटेंट अभी बाकी है, आते रहिएगा

16 April, 2013

...तो क्यों नहीं साहित्यिक पंडों की लेखन शैली का भाषाई श्राद्ध करा दें?

रचनात्मक लेखन की कश्ती पर सवार हिंदी के युवा साहित्यकारो, जरा ध्यान दीजिए... 
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साथियों, चाहे क्षेत्र कला का हो या... साहित्य का, बाजार में बिकता कंटेंट ही है. कुछ नयेपन की तलाश में कब कौन सी रचना खरीदार के दिल को छू जाए, कौन सा कंटेंट हिट हो जाए, कहना मुश्किल है! लेकिन अहम सवाल यह है कि हिंदी पर आधारित फिल्मों, न्यूज़ चैनलों, अखबारों व गीतों की मांग चरम पर है. फिर, अंग्रेजी की तुलना में हिंदी साहित्य क्यों पिछड़ जाता है? क्या वजह है कि हिंदी भाषी लेखक भी अंग्रेजी में खिलंदड़े तरीके से लिखकर 'बेस्ट सेलर' का ख़िताब पा लेता है. एक सफल किताब से अंग्रेजी लेखक करोड़ों रूपए बटोर लेता है. जबकि कई सारी प्रतिभाएं हिंदी में उम्दा लिखते हुए भी फांका-कस्सी करने को मजबूर हैं. अपना सब कुछ न्योछावर करने के बावजूद भी अपेक्षित सफलता नहीं मिलती देख, उनकी सृजन क्षमता असमय दम तोड़ देती है. हालात ऐसे बन गए है, मानो हिंदी में छपे उपन्यास या कहानी पढ़ना पाठकों की मजबूरी है. जबकि अंग्रेजी की किताबें चाहे उनका कंटेंट उच्छ्रंख्ल ही क्यों ना हो, उन्हें पढ़ना युवाओं के बीच 'पैशन' या 'स्टेटस सिम्बल' बन गया है.


मेरे एक मित्र प्रबंधन में स्नातक कर गुड़गांव के एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं. मैं उनके घर जब भी जाता हूं, वे बड़ी शान से अंग्रेजी के 'बेस्ट सेलर' उपन्यासों को दिखाते हैं. 'ये देखो- सलमान रश्दी का 'मिडनाइटस चिल्ड्रेन', चेतन भगत का 'टू स्टेट्स', 'वन नाईट एट कॉल सेंटर', रोबिन शर्मा का 'द मौंक हू सेल हिज फेरारी'. ... अरे हां, ये वाला तो दिखाया ही नहीं अमीश त्रिपाठी का 'वायुपुत्राज', हाल ही में आया है. क्या लिखता है बनारस का यह बंदा, मैं तो इसका फैन ही हो गया हूं.' मैंने पूछा- 'यार, एक बात बताओ हिंदी भाषी लोग भी अंग्रेजी साहित्य में ही मनोरंजन क्यों ढूंढते हैं. जबकि हिंदी लेखकों की इतनी सारी बेजोड़ किताबें बाजार में हैं कि पूरी जिंदगी में भी कोई उन्हें नहीं पढ़ पाए.'

तो उसने छूटते ही कहा- 'भाई, सच कहूं तो मैं अंग्रेजी के नए-नए शब्दों की जानकारी के लिए इस तरह की पुस्तके पढ़ता हूं. क्योंकि जिस दफ्तर में हूं, वहां के सहकर्मियों पर प्रभाव जमाने के लिए जान-बूझकर अंग्रेजी झाड़नी पड़ती है. ' फिर उसने जो कुछ बताया वह निश्चय ही गहन मंथन का विषय बनता है. कहा- 'जहां तक मैं समझता हूं, तीन कारणों से हिंदी प्रदेश के लोग अंग्रेजी की किताबें पढ़ते हैं. पहले वाले वे हैं जिन्हें अंग्रेजी की अच्छी समझ है, और खुद को एलिट दिखाने व बेड रूम की शोभा बढ़ाने के लिए ऐसी किताबे खरीदते हैं. दूसरा, वे जो मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन व अन्य तकनीकी विषयों के छात्र हैं. और अंग्रेजी भाषा सीखने, इस पर पकड़ बनाने के लिए पढ़ते है. तीसरा, वैसे लोग जिन्हें ना ठीक से हिंदी ही समझ में आती है ताकि साहित्य का रस्वादन कर सकें, ना ही अंग्रेजी.' कहना चाहूंगा कि तीसरी तरह की पाठकों की संख्या सबसे ज्यादा है, जो महज दिखावे के लिए पढ़ते हैं.
  
इसके बावजूद भी चंद ऐसे सवाल हैं, जो हर हिंदी भाषी के जेहन में खटकते रहते है- क्या हिंदी में कंटेंट की कमी है, जिससे कि किताबें बाजार में जगह नहीं बना पातीं? या प्रकाशन संस्थानों की उदासीनता व लेखकों के शोषण करने की गंदी लॉबी आदि इसके जिम्मेवार हैं? जिसके तहत नई प्रतिभाओं को घुसने नहीं दिया जाता या उनकी रोयल्टी मार ली जाती है. या फिर साहित्य के मठाधीशों ने विद्वता का लबादा ओढ़ लेखन की भाषा को इतना क्लिष्ट व जटिल बना दिया है, जोकि आम पाठकों के पल्ले नहीं पड़ती. हो सकता इन सभी कारणों के साथ कुछ और भी दुश्वारियां इस राह में हों. कितना आश्चर्य होता यह जानकर कि चाईनीज भाषा में लिखने वाले उपन्यासकार को विश्व का सबसे प्रतिष्ठित 'नोवल पुरस्कार' मिल जाता है. ...और कुछ दुःख भी कि विश्व की तीसरी बड़ी भाषा के रखवैया हम 50 करोड़ हिंदी वाले अभी तक उपेक्षित हैं.

क्या अब वह समय नहीं आ गया है, कि चिड़ियों, परियों, देश की कथा आदि छद्दं नामों से साहित्यिक उड़ान भर रहे, माकानाका की खोल में छुपे इन पंडों की लेखन शैली का भाषाई श्राद्ध करा दिया जाए? हिंदी लेखन में अरसे से चली आ रही भाषाई आडम्बर को दूर करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाई जाए? साथ ही इसे एक नया आयाम देते हुए कंटेंट को इतना सुगम व मनोरंजक बनाया जाए कि सबके जेहन में आसानी से रच-बस जाए? कुछ इस तरह कि विश्व के किसी भी कोने में रह रहा हिंदी भाषी युवक किताब को देखते ही लपक ले. जब अंग्रेजी में यह फंडा चल निकला है तो हिंदी में इसका प्रयोग क्यों नहीं हो? आखिर हम नए ज़माने के कलमची हैं और 'जेन एम' के लिए लिख रहे हैं.

आज के ग्लोबल दौर में पहनावा, खान-पान, बोल-चाल, कहें तो सब कुछ कॉकटेल हो चला है. तो फिर हम क्यों बाबा आदम के समय वाले थीम व भाषा को ढोएं. इतिहास की थोड़ी सी भी जानकारी रखने वाले इस तथ्य से अच्छी तरह मुखातिब होंगे कि जब भारत में 'बौद्द धर्म' का व्यापक प्रभुत्व बढ़ने लगा तो ब्राह्मणों ने हिन्दू धर्म का अस्तित्व बचाए रखने के लिए इसको बेहद सरल बना दिया. क्योंकि तब वक्त की यही मांग थी. इससे एक बड़ी सीख यह मिलती है कि समय के साथ जो नहीं बदलते वे गुमनामी की अथाह गर्त में खो जाते हैं.

एक बात पर गौर फ़रमाएंगे कि हिंदी लेखन को सरल बनाने की वकालत करने का मेरा मतलब भाषा के सस्तेपन नहीं, बल्कि नएपन से हैं. हिंदी साहित्य को कुछ ऐसा कंटेंट दें जो रोचकता की चाशनी में डूबे होने के साथ-साथ जमीन से भी जुड़ा हो. निरंतर प्रयास करने व नवीनता लाने से ही किसी चीज का ग्लैमर बढ़ता है. सूचना तकनीकी के तौर पर इन्टरनेट व सोशल साइट्स देवनागरी के लिए 'भागीरथी वरदान हैं.' जिनकी बदौलत आनेवाला वक्त हिंदी का ही होगा, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. वह दिन भी दूर नहीं जब पूरे संसार में हिंदी का डंका बजेगा. ...और हम इसके साक्षी बनेंगे.

14 April, 2013

यादें (3): वो जमाना जब दूध सस्ता और मनोरंजन महंगा था!

जब मैंने होश संभाला 5 साल की उम्र रही होगी, सन 88 का वर्ष था. वह दौर जब उदारीकरण की सुगबुगाहट में उनींदा भारत ‘इंडिया’ बनने की और अग्रसर था. यानी ‘भारत’ व ‘शाइनिंग इंडिया’ के बीच का वक्त. तब मनोरंजन के तौर पर लोगों के पास सीमित विकल्प थे. भले ही जिला मुख्यालय या बड़े शहरों में में रहने वाले सिनेमा घरों में बड़े परदे पर फिल्मों का लुत्फ़ उठाते, लेकिन गांवों में थियेटर, सर्कस, लौंडा नाच व मेरठ के लुग्दी उपन्यास का बोलबाला था. कुछ शौक़ीन लोग प्रदीप, आज अखबार व सारिका, धर्मयुग, कादंबनी, सरिता, मनोहर कहानियां, माया, इंडिया टुडे, मायापुरी जैसी पत्रिकाएं मंगाया करते. बच्चों में नंदन, चंदा मामा, लोटपोट, बालहंस व कॉमिक्स की धूम थी (इसकी जिक्र यादें (4) में). 

हां, इतना जरूर था कि कंप्यूटर व संचार क्रांति के आ जाने से गांवों में भी इक्के-दुक्के कुलीन घरों में टेलीफ़ोन की पैठ हो चुकी थी. यहां 18 इंच वाला सनमाईका का ‘श्वेत-श्याम टेलीविजन’ व ‘यूएचएफ’ एंटीना जिसके पास होता, वह आला दर्जे का समझा जाता. जो कि बिजली नहीं रहने पर बैट्री से भी चलता था.मेरे गांव में वर्ष 84 में ही बिजली आ गई थी. पर सनमाईका ब्रांड टीवी बाद के दिनों में घर में आया. मैं जब इसे देखने-समझने लायक हुआ तब ‘काका जी कहिन’, डॉ. राही मासूम राजा के उपन्यास पर आधारित ‘नीम का पेड़’, ‘द सोर्ड ऑफ़ टीपू सुल्तान’, ‘तलाश’, ‘व्योमकेश बक्षी’ जैसे धारावाहिक सबकी जुबान पर थे. 

उन्हीं दिनों नेपाल के दूरदर्शन ने ‘रामायण’ का प्रसारण शुरू किया. चूंकि मेरा गांव नेपाल की सीमा से नजदीक है. सो यहां का एंटीना भी इस चैनल को  साफ़-साफ़ पकड़ता. दिन में राष्ट्रीय चैनल की तस्वीर की गुणवता काफी घटिया रहती. लेकिन नेपाली चैनल की गुणवता उम्दा होने बावजूद इस पर हिंदी का एक मात्र यहीं कार्यक्रम आता. ‘रामायण’ देखने के लिए एंटीना को उतर दिशा में यानी नेपाल की तरफ घुमाना पड़ता. हर सप्ताह सोमवार की शाम 7 बजे नेपाल से ‘महाभारत’ का प्रसारण होता. बिजली गुल होने पर कार्यक्रम बाधित ना हो, इसके लिए बाजार से बैट्री चार्ज करा लाकर रखी  जाती. लोगों की संख्या बढ़ने से कमरा छोटा पड़ने लगा तो टीवी ओसारे पर रखा जाने लगा. 

इस कालजयी धारावाहिक की महिमा कुछ ऐसी फैली कि इसे देखने के लिए करीब 5 किलोमीटर दूर के गांव से भी लोग मेरे दरवाजे पर आने लगे. इस कारण टीवी दरवाजे से बाहर दुआरे पर आ गया. एक बड़ा सा तिड़पाल बिछाया जाता और पूरा दुआर दर्शकों से भर जाता. महिलाओं को आगे की पंक्ति में बिठाया जाता. इस दौरान श्रद्धा व भक्ति के आगोश में लोगों की अलौकिक एकता देखते ही बनती. वे नत-मस्तक होकर टीवी देखने में लीन हो जाते. धारावाहिक में  पात्रों का इतना सजीव चित्रण था कि दोनों हाथ जोड़े कुछ महिलाएं, कभी-कभी भावुक दृश्यों को देख भाव-विह्वल हो आंखों से आंसू भी टपकाने लगतीं. 

गांव में मवेशी पालना किसानों का अनिवार्य कर्तव्य माना जाता है. दादा ने भी दरवाजे पर दो-दो भैंस पाल रखे थे. इस लिहाज से कि एक दूध देना बंद कर देती तो दूसरी वाली ब्याती. इस तरह घर में दूध, दही व घी भरपूर मात्रा में मिलते. दादी मिट्टी के चूल्हे पर कड़ाही में दूध खौला कर पझाने लिए छोड़ देतीं. थोड़ी देर बाद ही उसमें मोटी छाली पड़ जाती. फिर एक बड़े ग्लास में छाली के साथ दूध भरके मुझे पीने को मिलता. उपले की मद्दिम आंच पर नदिया (हांड़ी) में मीठा दही जमाने की कला कोई दादी से सीखे. क्या सोंधी गंध रहती थी, अकेले ही चूड़े के साथ कोई भी एक-आध किलो दही गटक जाए! दादी सालों भर दही से निकलने वाली छाली को एक बर्तन में इकठ्ठा करती रहतीं. फिर ‘रही’ से मथकर उसमें से मक्खन निकालतीं. मक्खन को जब चूल्हे की आग पर खौला कर ठंडा किया जाता तो घी बन जाता. मक्खन गर्म करने के दौरान कड़ाही में पपड़ी जम जाती, जिसे हमलोग दाढ़ कहते. कमाल का स्वाद रहता इसका, घर के सारे बच्चे चटखारे लेकर खाते. 

दादी पुराने ख्यालात की महिला थीं, सो लड़कियों से ज्यादा लड़कों के प्रति अनुराग रखतीं. वह अक्सर कहां करतीं- ‘गाय के बछड़े व घर के बेटों को दूध पिलाना कभी भी नागा नहीं गुजरता.’ दरअसल इसके पीछे दादी की पारंपरिक सोच थी कि उक्त दोनों ही जीव कमाने वाले होते हैं, जिससे कि गृहस्थी चलती है. दादा ने चारा काटने, भैंसों को खिलाने व अन्य घरेलू कामों के लिए एक नौकर भी रखा था. लेकिन वे नौकर की बजाय खुद पर ज्यादा भरोसा करते थे. कभी-कभार अपने हाथों से ‘लेडीकट्टा मशीन’ से चारा काटने लगते और मैं डोंगे में पुआल व घास लगाता. मैं भी आंशिक रूप से मशीन चलाने में दादा का हाथ बंटा देता. मशीन क्या था बोले तो एक तरह से देहाती जिमखाना, जिस चलाते हुए शरीर का व्यायाम भी हो जाता. 

दोपहर के बाद दादा भैसों को चराने के लिए नहर की तरफ ले जाते. वह कहते कि पशुओं को भी सरेह की सैर कराना जरूरी है. इसी बहाने भैंसे घूम-फिर कर लेती हैं व इन्हें खाने को ताजा घास भी मिल जाती है. जिसका सकारात्मक असर इनकी सेहत व दूध पर भी पड़ता है. मैं भी इसी फ़िराक में रहता कि कब दादा भैंस चराने निकले और मैं पीछे-पीछे हो लूं. मां को यह फूटे आंखों नहीं सुहाता था कि मैं गंवार लड़कों जैसा आंवारा घूमता फिरूं. इस बात पर गाहे-बगाहे मुझे डांट-फटकार तो कभी पिटाई भी मिल जाती. लेकिन वो कहते हैं ना कि- ‘जहां चाह होती है, वहां राह भी.’, आखिर मैं कहां मानने वाला था. 

एक आम देहाती बच्चे की तरह मुझे भी दादा से बेहद लगाव था. दूसरे, मैं चाहे लाख गलतियां कर लूं दादा अक्सर मेरी तरफदारी करने से बाज नहीं आते थे. मैं जैसे ही घर से भाग सरेह में पहुंचता, दादा मुझे भैंस के पीठ पर बैठा देते. भैस जब चरते हुए उबड़-खाबड़ रस्ते से गुजरती तो उसकी मांसल पीठ पर बैठे हुए काफी गुदगुदी होती. उस सुखद अनुभव को कलम से बयां करना नामुमकिन है. लिहाजा भैस की सवारी का यहीं तो आनंद था, जिसका लोभ संवार पाना मेरे लिए कठिन काम था. 

पर यह विडंबन ही है कि प्रकृति से किसी की ख़ुशी ज्यादा दिनों तक नहीं देखी जाती. कुछ ऐसा ही बुरा मेरे साथ भी हुआ. एक दिन भैंस पर सवार मैं अपनी धुन में मगन था कि उसे बगल की झाड़ियों में कुछ खुरखुराने की आवाज सुनाई दी. अब मुई भैस ने आंव न देखा ताव और उछलते हुए भागने लगी. इसी चक्कर में उसके पगहा से मेरा हाथ छूट गया. मैं नीचे और भैंस का अगला पैर मेरे बदन पर. वो तो गनीमत था कि उसका पिछला पैर मेरे सीने पर नहीं पड़ा, वरना परलोक सिधारने में कोई हर्ज नहीं था. मामूली चोट व खरोच आने के साथ सही-सलामत बच गया, यहीं सोच भगवान को लाख-लाख बधाईयां दी. फिर तो दोनों कान पकड़ इस मटरगश्ती से तौबा ही कर ली. 

समय अपनी रफ़्तार में भागता रहा. और वर्ष 90 में ‘महाभारत’ धारावाहिक शुरू हुआ. तब तक देहात के भी अधिकांश घरों में टीवी आ चुका था. लेकिन रंगीन टीवी का ग्लैमर सबके सिर पर चढ़ा हुआ था, कई तरह की बातें सुनने को मिलतीं-  ‘क्या मजा आता है देखने में, सब कुछ असली दीखता है, साफ-साफ व रंगीन.’ मेरे पड़ोस के दादा  पुराने जमींदार थे ...और काफी रईसाना मिजाज था उनका. वे जिंदगी को ऐशो-आराम से जीने में यकीन करते मतलब- ‘क्या लेकर आए हो, और क्या लेकर जाओगे.’ यह बात अलग थी कि ठाट-बाट को बरक़रार रखने में उनकी अच्छी-खासी जमीन बिक चुकी थी. सच बोलूं तो... उनकी माली हालत कुछ हद तक प्रेमचंद की ‘पर्दा’ कहानी वाली हो चली थी. 

उनके दो बेटे थे पर वे दोनों से अलग रहते. पत्नी से बेहद प्यार था उनको और इसी प्यार का वास्ता देकर ओनिडा कंपनी का कलर टीवी घर लाए. पूरे गांव में यह खबर फ़ैल गई. क्योंकि उस समय रंगीन टीवी खरीदना सबके वश की बात नहीं थी. पूरे 20 हजार रूपए खर्च करने पड़ते थे. मैं भी हमउम्र बच्चों के साथ रविवार को उनके घर ‘रामायण’ देखने चला जाता. एक दिन जाने क्या बात हुई कि वे दर्शकों की भीड़ से बेहद खफ़ा हो गए. बड़बड़ाते हुए बोलने लगे- ‘टीवी मैंने अपनी बीवी के लिए ख़रीदा है ना कि गांववालों के लिए.’ फिर उन्होंने बाबा आदम के जमाने की कठैया बंदूक निकाली और ऐसे ही चला दिए. हालांकि गोली भरवी थी और एक  कुत्तिया को जा लगी, बेचारी मौके पर ही बेमौत मारी गई. हम लोग तो वहां से ऐसे भागे कि घर आकर ही रुके.  

वर्ष 92 में डिश एंटीना की पहुंच से केबल चैनलों ने भी अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी. वीसीपी, वीसीआर, फ्रीज, वाशिंग मशीन आदि का वजूद महज शहरों तक ही सीमित था. गांव में लोग इन्हें विलासिता की चीजे समझा जाता. तब दूरदर्शन पर हर शनिवार व रविवार को फिल्में आती थीं, इसलिए हम लोगों को बेसब्री से इस दिन का इंतजार रहता. शादी-ब्याह या अन्य शुभ आयोजनों में मनोरंजन के तौर पर नई फिल्में देखने के लिए वीसीपी व रंगीन टीवी भाड़े पर लाया जाता. जारी...

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यादें (2): ...और 'मिशन स्कूल' में पढ़ाई का सपना अधूरा रह गया!


07 April, 2013

यादें (2): ...और 'मिशन स्कूल' में पढ़ाई का सपना अधूरा रह गया!


यादाश्त पर जोर दूं तो 90 का शुरूआती दशक था वह. तब मैं दूसरी कक्षा में पढ़ता था पड़ोस के ही प्राथमिक विद्दालय में, नाम- राजकीय कन्या प्राथमिक विद्दालय, बथानी टोला, कनछेदवा. बोले तो- ईट की दीवार खप्पड़े की छत वाली दो कमरे की ईमारत, बाहर में छोटा सा बरामदा, पर फर्श पर प्लास्टर नहीं था. इन्हीं कमरों में 1-5वीं तक की कक्षाएं चलती थीं. जहां मैं पड़ोस के बच्चों के साथ किसी दिन बोझिल तो कभी उत्साही क़दमों से गपियाते हुए स्कूल जाता.  

चूंकि जमीन पर बैठ कर पढ़ना होता, इसलिए सब अपने साथ प्लास्टिक या चट्टी का बोरा लाते. कक्षा में पहुंचते ही पहले हम-पहले हमकी तर्ज पर बोरा से जगह छेंकने के क्रम में जबर्दस्त हुड़दंग मचती थी. आगे की पंक्ति में बैठने की जगह जिसे मिल गई, वह खुद को नसीब वाला समझता. 

हर कक्षा में मॉनिटरके साथ एक सफाईमंत्री भी होता था. सबसे तेज छात्र को यह जिम्मेवारी सौंपी जाती. मॉनिटर अपनी कक्षा के छात्रों की गतिविधियों की रिपोर्ट प्रधान शिक्षक को करता. उसका रौब कुछ ऐसा था कि कक्षा के अन्य बच्चे उससे भय खाते. क्या पता? कब किस की शिकायत झूठी ही सही प्रधानाध्यापक से कर दे...और बदले में पिटाई मिले या फिर मुर्गाबना दिए जाए. इसी कारण मॉनिटर से मिलजुल कर रहने में ही सबकी भलाई थी. भले ही वह लाख गलतियां कर ले, उसकी खोज-खबर नहीं ली जाती

यानी पद की आड़ में नजायज भी जायज था. कहा गया है कि बचपन का दौर मासूमियत भरा होता है, जिसमें दुनियावी छल-प्रपंच के लिए कोई जगह नहीं होती. पर मॉनिटर का अन्य हमउम्र बच्चों के साथ व्यवहार की साइकोलोजी पर गौर करें तो इससे कुछ और बात ही उजागर होगी. मुझे तो लगता है कि राजनीति कूटनीति की शुरूआत सबसे पहले प्राइमरी स्कूल से ही होती है.  

रही सफाई मंत्री की बात तो वह बच्चों से स्कूल का मैदान साफ करवाता. उसके बाद सभी छात्र कतार में खड़े हो दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना...या मां शारदे कहां तू वीणा बजा...का गान करते हुए प्रार्थन करते. फिर कक्षा शुरू हो जाती. जो बच्चे प्रार्थना के बाद स्कूल पहूंचते उन्हें दंड स्वरूप मुर्गाबनना पड़ता

यह कहने से गुरेज नहीं कि मैंने भी यह अमानवीय सजा कई बार झेली! अमानवीय इसलिए कि उम्र भले ही कम हो, पर हमउम्र के बीच  इम्प्रेशन खराब होने का डर किसे नहीं होता? खुले मैदान में करीब आधे घंटे तक उकडू बैठ घुटनों के नीचे से हाथ लाकर कान पकड़े रहना, सबके बस का रोग नहीं था. कनपट्टी गरमाने के साथ पूरा बदन पसीने से तर-बतर होता ही, आंखों के आगे भी अंधेरा छाने लगता. कमर पीठ का ना सहने योग्य दर्द अलग से. ...उसपर छुट्टी के बाद संग के बच्चों का चवनियां मुश्की के साथ चिढ़ाना जले पर नमक सरीखा लगता. 

स्कूल में सोम, मंगल, बुध गुरुवार के दिन काफी बोरियत भरे लगते. शुक्रवार को यह सोच सुकून मिलता कि शनिवार को आधे दिन ही पढ़ाई होगी. फिर रविवार को तो साप्ताहिक बंदी से बल्ले-बल्ले यानी फुल टूश मस्ती रहती ही. गर्मी के मौसम की तुलना में सर्दी का दिन प्यारा लगता. क्योंकि इस मौसम में कड़ाके की ठंड पड़ती. दिन भी बेहद छोटे होते, इसलिए भरपूर छुट्टी रहती.  

उन दिनों अभिभावक तीसरी कक्षा के बच्चे को ही लिखने के लिए कॉपी कलम देते थे, क्योंकि हैण्ड राइटिंग बिगड़ने का डर रहता. सो, दूसरी तक के  सारे बच्चे जामा के पॉकेट में खल्ली (खड़िया) रखते, जो कि मोटहिया स्लेटपर लिखने के काम आता. हालांकि खल्ली की तुलना में पेंसिल ज्यादा चलता और...लिखावट भी अच्छी होती. लेकिन महंगा होने के चलते इसका प्रयोग कम बच्चे ही कर पाते. अन्य बच्चे कहीं पेंसिल चुरा ना लें, इसका भी डर अलग से रहता.  

स्लेट का लिखा मिटाने के लिए यूं तो पानी से भिंगोए गए थर्मोकोल या सुत्ती कपड़े के टुकड़े काफी थे, पर इनसे स्लेट पर चिकनाई पैदा हो जाती. और लिखते वक्त खल्ली या पेंसिल फिसलने लगते. सो, स्लेट को गाढ़ा काला करने के लिए काफी जतन करनी पड़ती. इसके लिए भेंगरइया (भृंगराज) की हरी पत्तियां इस्तेमाल में लाते, जो कहीं भी सड़क किनारे मिल जाती. उसे देखते ही खोंटने के लिए बच्चे लपक पड़ते. इन पत्तियों का रस निचोड़कर स्लेट पर उड़ेला जाता. फिर नदिया के पनिया नदिये में जो, हमर स्लेटवा सुखवले जोका छंद पढ़ते हुए स्लेट को हवा में हिला सुखाया जाता.  

जाने क्यों इस मोटहिया स्लेटसे सौतिया डाहसी बनी रहती? एक दिन मैं और मेरे चचेरे भाई सुधांशु स्कूल चले जा रहे थे. ये जिक्र करते हुए कि कैसे इस मुए स्लेट से पीछा छूटे. अभी कुछ तय हो, तभी एक मैसी ट्रैक्टर आता दिख पड़ा. हमने आंखों ही आंखों में इशारा किया बिना पल भर समय गंवाए दोनों ने स्लेट को उसके पहिया के नीचे रख दिया. अब उस मोटहिया स्लेटकी कचूमर देखने लायक थी.  

मन में किसी भारी बोझ के उतरने का एहसास हुआ, लेकिन दिमाग के एक कोने में अंजाना भय भी सांप की तरह कुंडली मारे फुंफकार रहा था. खैर, घर लौटने का पुख्ता बहाना हमारे पास था. घर आए तो वहीं हुआ जिसका अंदेशा था. यहां किसी ने हमारी बातों पर विश्वास ही नहीं किया...हमारी चोरी सरे आम पकड़ी गई. सबका यही कहना था कि जब दुर्घटना हुई रहती तो हम बाल-बाल कैसे बच गए? ना कोई खरोच ना ही जख्म फिर सब कुछ स्लेट पर ही क्यों गुजरा 

और...इतनी बेरहमी से हमारी धुलाई की गई कि पूछिए मत. जाने कितनी छड़ी शरीर पर ही टूट गई! पिता जी तो गुस्से में आकर मेरी किताबें छीन लिए. कहा- आज से पढ़ाई बंद, अब खेती-बाड़ी देखो. कहना चाहूंगा कि काफी मिन्नतों के बाद ही पढ़ाई की अनुमति मिली. 

स्कूल में शारीरिक शिक्षा के तौर पर सप्ताह में कुछ दिन खेल एक दिन कला विषय की घंटी रहती. लंगड़ी-बिच्छी’, ‘सही-टिका’, ‘आईस-पाईस’, लुका-छिपी’, ‘दुलदुल घोड़ाया कबड्डी’...कितने सारे खेल गिनाऊ. मुझे तो आईस-पाईस लुका-छिपी जैसे अहिंसक खेल ही अच्छे लगते. क्योंकि लंगड़ी-बिच्छी में पैर पर टंगड़ी मारनेकी कला से मैं अंजान था. उलटे बचाव करने में ही खुद के पैर चोटिल हो जाते

बाद में कबड्डी खेलने का भी शौक चर्राया. पर एक दिन खेलने के दौरान विपक्ष के गोल में धरा गया. फिर तो हल्दी-कबड्डीबोलवाने के लिए लड़कों ने इतने जोर से कनपट्टी की मालिश की कि महीनों तक वह हिस्सा लाल रहा. उसके बाद तो इस लंपट खेल से तौबा ही कर ली

वहीं कला की घंटी में संगीत का क्लास लगता. जिसमें सारे बच्चे बारी-बारी से खड़े होकर गाना सुनाते. उस वक्त में हिट फ़िल्मी गीत साजन मेरा उस पार है... मैं नागिन तू सपेरा...सबके होठों पर रहतें. मेरी बारी आती तो इसी में कोई एक तुकबंदी अंदाज में सुना देता बिल्कुल कविता की तरह. दूसरी कक्षा में वर्ष भर बस यहीं गाने गाता रहा. आगे की कक्षा में पढ़ने वाली बड़ी उम्र की लड़कियों को गाते हुए सुनना सुखद एहसास था. 

रोजाना स्कूल में अंतिम घंटी गिनती-पहाड़ा की होती थी. इस दौरान सभी बच्चे खड़े हो जोर-जोर से सैया निनानवे अंठानवे संतानवे... एक्का-एक दो दूनी चार...का कोरस आलाप (सामूहिक गान) करतें. क्या मनभावन दृश्य बनता तब, शब्द उच्चारण की जुबानी कसरत से इतर सबकी नजरें घंटी की तरफ जमी रहतीं! कब छुट्टी की घंटी बजे और सबसे पहले अपना बस्ता-बोरा समेट कक्षा से भागें, मानो जेल से छुटे हों.

उस वक्त स्कूल में दो शिक्षक थे. एक रमेश सर दूसरी, गांव की ही देवी जी’, जो प्रधानाध्यापिका भी थीं. रमेश सर यानी श्री रमेश प्रसाद श्रीवास्तव करीब 28 किलोमीटर दूर अरेराज के टिकुलिया से रोजाना साइकिल चला स्कूल आते थे. जबकि देवी जीउर्फ़ श्रीमती राजमति देवी गांव की ही थीं. रमेश सर, कभी-कभी इन्हीं के दरवाजे पर ठहर जाते.  

क्योंकि तब गांव में शिक्षकों को बेहद सम्मान मिलता था. जैसे ही कोई शिक्षक तबादले से यहां आया कि अपने घर ठहराने के लिए लोगों में होड़ मच जाती. दरअसल इसके मूल में उनका स्वार्थ भी निहित रहता. चूंकि गांव में रहने के लिए जगह की कमी होती नहीं, दूसरा यह भी लालच रहता कि माट...साब कम से कम घर के बच्चों को मुफ्त में पढ़ा ही देंगे. बदले में दो वक्त की रोटी खाएंगे और क्या, समाज में इज्जत तो बढ़ जाएगी

रमेश सर बेहद गंभीर शांत तबियत के जीव थे. किसी बच्चे की शैतानी पर खूब गुस्साते तो दो-चार सटकी(छड़ी) लगा देते. दरवाजे पर जाकर घरवालों से भी शिकायत करते, ‘आपका लड़का बदमाशी करने लगा है. ध्यान दीजिए वरना बिगड़ जाएगा.हां, वह बच्चों पर प्यार भी खूब लुटाते थे. जबकि देवी जी ठीक उनके विपरीत स्वभाव वाली महिला थीं, मोटी-तगड़ी, दबंग प्रवृति की थोड़ी गुस्सैल भी. कहने को वह कुल जमे 4 बच्चों की मां थीं पर ममता उनमें कभी दिखी नहीं.  

महिला होकर भी अपने जमाने की मिडिल पास थीं, सो इसपर उनका गुमान स्वाभाविक था. बचपन में हुई किसी बीमारी की वजह से लंगड़ाते हुए चलतीं, हाथ में अक्सर बांस की छड़ी लेकर. क्या मजाल कि कोई छात्र गलती करते हुए पकड़ा जाए और मोहतरमा वगैर सटकिआए (पिटे) उसे छोड़ दें. क्षमा शब्द तो उनके शब्दकोश में था ही नहीं. जब कभी सामने नजर जातीं तो बिना कोई गलती किए ही हमारी घिग्घी बंध जाती. जाने कब किसी बात पर नाराज हो हथेली पर छड़ी बरसाने लगें

इसी आपा-धापी में तीसरी कक्षा में पहुंच गया. भगवान का शुक्र था  मोटहिया स्लेट से पीछा छूटा. पिताजी वैशाली प्रकाशन की सादी कॉपियां खरीद लाए. नसीहत मिली कि पहले नीली स्याही में सरकंडे की कलम डुबोकर रोजाना चार-पांच पन्ने से लिखने का अभ्यास करो, हैंड राइटिंग सुधारने के लिए. फिर निबही या रीफिल वाली कलम मिलेगी

दस पैसे में नीली स्याही का सैशे आता था जिसे फाड़कर दवात में घोला जाता. तब रेडीमेड चेलपार्क स्याहीकी  भी पूरी धूम थी. लेकिन शौक़ीन पैसे वाले घरों में ही यह खरीदी जाती. जिसमें मैं शामिल नहीं था. कुछ महीने बाद लिंक रीफिल वाली कलम मुझे मिल गई, क्योंकि निबही वार्लिटीकलम आउट डेटेड हो चली थी. हालांकि उससे अक्षर में काफी निखार आता, लेकिन जब विकल्प  मौजूद था तो बार-बार स्याही भरने की जहमत कौन उठाता भला. अब लिखते वक्त हाथ थोड़ा सध गया था, पर सरकंडे की कलम में स्याही पोत रोजाना एक पन्ना लिखने का अभ्यास आगे की कक्षाओं में भी जारी रहा. 

उन दिनों मिशनरी स्कूलों का काफी क्रेज था. और आज की तरह कुकुरमुते समान हर गली-मोहल्ले में इनका बोर्ड टंगे नहीं मिलता था. यह खबर जोर-शोर से फैली कि गांव से करीब 3 किलोमीटर दूर हरसिद्धि बाजार पर के आर मिशन स्कूलखुल रहा है. फिर तो सारे अभिभावकों में अपने बच्चे का नामांकन कराने की होड़ मच गई. चर्चा यह भी थी कि बेतिया के प्रतिष्ठित के आर स्कूल की शाखा है. यहां के सभी शिक्षक क्रिश्चन हैं जो अंग्रेजी माध्यम से नर्सरी-पांचवी तक के छात्रों को पढ़ाएंगे. बच्चों को अभिवादन के तौर पर पांव छूने या प्रणाम की बजाय गुड मोर्निंग’, ‘गुड इवनिंग गुड नाईटकहने का चलन सिखाया जाता है

जाहिर सी बात है, जब अंग्रेजीदां बनना है तो देहात की गंवार परंपरा को तिलांजलि  देनी ही होगी. किताब से लेकर बातचीत भी अंग्रेजी में..., कैंपस में तो हिंदी बोलने पर सख्त पाबंदी है. मानो स्कूल ना होकर कोई औषधालय हो जहां बच्चों को कोई घुट्टी पिला दी जाएगी. और सभी दनादन अंग्रेजी झाड़ने वाले विलायतीबाबू बन जाएंगे

पिता जी भी एडमिशन फॉर्म लाए. पता चला कि नामांकन टेस्ट के आधार पर होगा. सरकारी स्कूल में तीसरी के छात्र को वहां पहली कक्षा में जगह मिलेगी. क्योंकि कोर्स की सारी किताबे नर्सरी से ही अंग्रेजी में है. इसलिए बुनियाद सुधारने के लिए यह जरूरी है. हालांकि पिता जी ने प्राचार्य को दूसरी कक्षा में मेरा नाम लिखाने के लिए राजी कर लिया. पिता जी ने बताया कि स्कूल के लिए अलग ड्रेस कोड लागू है. जिसे बिना पहने वहां इंट्री नहीं मिल सकती

सोम से शुक्रवार तक खाकी हाफ पैंट उजला शर्ट, जबकि शनिवार को लाल रंग वाले पैंट के साथ ग्रे शर्ट पहनना है. गले में नीले रंग की टाई पर स्कूल का बैच कंधे पर बैग लटकाना होगा. मैं तो कई रात तक ये सब सोच-सोचके सो नहीं सका कि नए ड्रेस में टाई लटकाए स्कूल जाते वक्त कैसा दिखुंगा? कहीं अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाया तो स्कूल से नाम ही कट जाए. बालपन की सोच भी काफी हैरत अंगेज होती है. बिल्कुल किसी फिक्सउपन्यास की तरह काल्पनिक हकीकत से परे, जो कभी रोमांचक बन गुदगुदाती है तो डराती भी. 

लेकिन यहां तो होनी को कुछ और ही मंजूर था. पिता जी ने जाने किन कारणों से कांवेंट में भेजने का इरादा बदल दिया. जबकि साथ के कई बच्चों के अभिभावकों ने उनका नाम वहां लिखवा दिया. वे नए ड्रेस में लकदक पीठ पर बैग लटकाए स्कूल जाने लगें. मैं उन्हें देख इसी बात पर इत्मीनान कर लेता कि मिशन स्कूलमें पढ़ना अपने किस्मत में ही नहीं लिखा. और वे बच्चे मुझे वहीं फटे-पुराने कपड़े में देख चिढ़ा कर कहते, ‘वो देखो सैंट बोरिस का छात्र जा रहा है! 

दरअसल प्लास्टिक के  बोरा में बीटीसी की किताबें लपेट बस्ता बनाया जाता और स्कूल में उसी बोरा को बिछा बैठा भी जाता था. इसी कारण गांवों में सरकारी विद्दालय को सैंट बोरिसके उपनाम से संबोधित कर माखौल  उड़ाया जाता. लेकिन जो सपाट नहीं चले शायद उसी का नाम जिंदगी है, जिसमें हमेशा उतार-चढ़ाव आना अनिवार्य शर्त है. महज दो साल बाद ही यह खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गई कि के आर मिशनवाले भाग गए. वजह यह संस्थान फर्जी था, बेतिया वाला नहीं. सुनकर दिल को बेहद तसल्ली मिली. साथ ही पिता जी की दूरदृष्टि भरी सोच पर इतराया भी, जिसकी बदौलत कम-से-कम हम तो ठगाने से बच गए थे!  जारी...

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देवनागरी का ज्ञान ही मेरे जीवन की बड़ी कमाई!
यादें (3): वो जमाना जब दूध सस्ता और मनोरंजन महंगा था!